Dark Space:  वैसे तो अंतरिक्ष में सूरज, अरबों तारे, चमकती हुई गैलेक्सी और काफी ज्यादा एनर्जी है. लेकिन इसके बावजूद भी इसका ज्यादातर हिस्सा पूरी तरह से अंधेरे से घिरा हुआ होता है. एस इसलिए नहीं है कि वहां रोशनी नहीं है. बल्कि अंतरिक्ष का अंधेरा इस बात का नतीजा है कि रोशनी कैसे ट्रैवल करती है, ब्रह्मांड कैसे विकसित हुआ और इंसानी आंखें कैसे काम करती हैं.

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नहीं है कोई एटमॉस्फियर

पृथ्वी पर आसमान चमकदार और नीला दिखाई देता है क्योंकि सूरज की रोशनी हमारे एटमॉस्फियर के साथ इंटरेक्ट करती है. हवा के मॉलिक्यूल, धूल और पानी की भाप आने वाली सूरज की रोशनी को सभी दिशाओं में बिखेर देते हैं. यह बिखरी हुई रोशनी आसमान को भर देती है. इस वजह से यह तब भी चमकता है जब सूरज सीधे सिर के ऊपर नहीं होता.

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अब क्योंकि अंतरिक्ष लगभग एक परफेक्ट वैक्यूम है, इस वजह से रोशनी को बिखेरने के लिए कोई हवा, धूल या जरिया नहीं है. यही वजह है कि रोशनी बिना फैले सीधी रेखाओं में ट्रेवल करती है. जब तक रोशनी की किरण किसी ग्रह, चांद या फिर स्पेसक्राफ्ट जैसी किसी चीज से टकराकर सीधे आपकी आंखों में नहीं पड़ती तब तक आप उसे अच्छी नहीं पाएंगे.

फैला हुआ ब्रह्मांड 

खगोलविदों ने एक बार एक काफी मशहूर सवाल पूछा था जिसे ओल्बर्स पैराडॉक्स के नाम से जाना जाता है. अगर ब्रह्मांड में अनंत संख्या में तारे हैं तो रात को आसमान पूरी तरह से चमकदार क्यों नहीं है? इसका जवाब ब्रह्मांड की सीमित उम्र और फैलाव में छिपा हुआ है. ब्रह्मांड लगभग 13.8 अरब साल पुराना है. इसका मतलब है कि काफी दूर के तारों और गैलेक्सी से आने वाली रोशनी को अभी तक हम तक पहुंचाने के लिए पूरा समय नहीं मिला है. वे जगह इस वजह से अंधेरे में नहीं रहती हैं क्योंकि वहां तारे नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उनकी रोशनी अभी भी ट्रेवल कर रही है. 

इंसानी आंखों के लिए नहीं है रोशनी 

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अगर इंसानी आंखें इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेट या रेडियो तरंगों को देख पातीं तो अंतरिक्ष कभी भी अंधेरे में नहीं दिखता. यह ऊर्जा, गर्मी, रेडिएशन और गति से भरा हुआ दिखता. अंतरिक्ष के अंधेरे में दिखने की एक और वजह यह है कि तारे आकाशगंगाओं के अंदर गुच्छों में है ना के पूरे ब्रह्मांड में समान रूप से बिखरे हुए.

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