तमिलनाडु की राजनीति में मई 2026 की यह तपिश केवल मौसम की नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों की है. अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी TVK ने राज्य में एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा कर दी है. खबर है कि यदि TVK के 108 नवनिर्वाचित विधायकों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया, तो राज्य में सरकार चलाने का ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है. यह कदम उस समय उठाया जा रहा है, जब राज्य में द्रविड़ राजनीति के दो दिग्गज DMK और AIADMK कथित तौर पर टीवीके को सत्ता से बाहर रखने के लिए एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं.

विधानसभा की गणित और बहुमत का संकट

तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 118 का है. यदि टीवीके के 108 विधायक एक साथ इस्तीफा देते हैं, तो सदन की प्रभावी संख्या घटकर मात्र 126 रह जाएगी. ऐसी स्थिति में बहुमत का आंकड़ा भी गिर जाएगा, जिससे शेष पार्टियों के लिए सरकार बनाना तकनीकी रूप से आसान तो हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक नैतिकता के आधार पर यह बहुत बड़ी चुनौती होगी. 108 सीटों का एक साथ खाली होना राज्य के इतिहास में एक ऐसा शून्य पैदा कर देगा जिसे भरना आसान नहीं होगा.

क्या दोबारा कराने होंगे चुनाव?

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) की धारा 151ए के अनुसार, यदि कोई विधानसभा सीट खाली होती है, तो चुनाव आयोग को छह महीने के भीतर वहां उपचुनाव कराने होते हैं. 108 सीटों पर एक साथ उपचुनाव कराना अपने आप में किसी मिनी-जनरल इलेक्शन जैसा होगा. टीवीके का यह कदम इसी कानून को हथियार बनाकर चला गया है, ताकि डीएमके-एआईएडीएमके के संभावित गठबंधन को लंबे समय तक चैन से न बैठने दिया जाए. उपचुनावों के नतीजे यह तय करेंगे कि जनता वास्तव में किस पार्टी के साथ खड़ी है.

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द्रविड़ दलों की साठगांठ बनाम टीवीके की चुनौती

टीवीके के इस कड़े रुख के पीछे वह आशंका है, जिसमें कहा जा रहा है कि डीएमके और एआईएडीएमके पर्दे के पीछे हाथ मिला रहे हैं. टीवीके, जो चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, का दावा है कि जनमत उनके पक्ष में है. ऐसे में दो पारंपरिक विरोधियों का एक साथ आना मतदाताओं के साथ धोखा होगा. सामूहिक इस्तीफे की यह चेतावनी इसी गठबंधन को रोकने के लिए एक राजनीतिक ढाल के रूप में इस्तेमाल की जा रही है, ताकि राज्य में दोबारा चुनाव की स्थिति पैदा हो जाए.

विधायकों के इस्तीफे के बाद क्या विकल्प?

अगर 108 विधायकों के इस्तीफे के बाद चुनाव आयोग उपचुनाव नहीं करा पाता या राज्य में कोई भी दल स्थिर सरकार देने की स्थिति में नहीं रहता, तो राज्यपाल के पास विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. ऐसी स्थिति में तमिलनाडु को मध्यावधि चुनाव की ओर धकेला जा सकता है. यह राज्य के खजाने और प्रशासनिक मशीनरी पर भारी बोझ होगा, लेकिन टीवीके का मानना है कि जनादेश का अपमान सहने से बेहतर दोबारा जनता की अदालत में जाना है.

शपथ ग्रहण से पहले इस्तीफे का तकनीकी संकट

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि 8 मई 2026 तक की रिपोर्ट्स के अनुसार, इन विधायकों ने अभी आधिकारिक तौर पर शपथ नहीं ली है. संवैधानिक रूप से इस्तीफा तभी प्रभावी माना जाता है जब सदस्य सदन की सदस्यता की शपथ ले चुका हो. इसलिए, टीवीके के विधायकों द्वारा दी गई यह चेतावनी वर्तमान में एक रणनीतिक दबाव ज्यादा नजर आ रही है. अगर वे शपथ के तुरंत बाद इस्तीफा देते हैं, तभी चुनाव आयोग के लिए उपचुनाव कराना अनिवार्य होगा.

संवैधानिक संकट और राज्यपाल की भूमिका

ऐसी स्थिति में राजभवन की भूमिका सबसे निर्णायक हो जाती है. जब सदन की लगभग आधी सीटें खाली हों, तो किसी भी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना संवैधानिक रूप से विवादित हो सकता है. क्या राज्यपाल अल्पमत के आधार पर बनी सरकार को मंजूरी देंगे या राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करेंगे? यह सवाल पूरे तमिलनाडु में चर्चा का विषय बना हुआ है. टीवीके की यह रणनीति दरअसल राज्य को एक बड़े संवैधानिक गतिरोध की ओर ले जा रही है.

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