Europe Russia Alliance: दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद से अमेरिका और यूरोप इकोनॉमिक्स, सिक्योरिटी और साझा पॉलिटिकल वैल्यूज के साथ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. मार्शल प्लान ने यूरोप की इकोनॉमी को फिर से बनाया है और 1949 में बने नाटो ने आर्टिकल 5 के तहत सामूहिक सुरक्षा की गारंटी भी दी है. 70 से ज्यादा सालों से इस गठबंधन ने ग्लोबल ऑर्डर को आकार दिया है. लेकिन बीते कुछ सालों में दरारें देखने को मिल रही हैं. यूक्रेन में रूस के युद्ध ने नाटो की अहमियत को और भी ज्यादा मजबूत कर दिया है. लेकिन 'अमेरिका फर्स्ट, पॉलिटिक्स, क्लाइमेट पर असहमति और चीन पर अलग-अलग विचारों की वजह से अमेरिका के साथ दोस्ती पर यूरोपीय संदेह ने एक बड़ी बहस को हवा दे दी है. अगर यूरोप अमेरिका को छोड़ दे और खुद को रूस के साथ जोड़ ले तो इसके बाद क्या नतीजा हो सकता है. इस बदलाव का ग्लोबल ऑर्डर पर कैसे असर पड़ेगा. आइए जानते हैं.
नाटो का पतन
पहला और सबसे सीधा नतीजा नाटो का प्रभावी अंत होगा. यूरोप के बिना नाटो अपना मकसद, भूगोल और वैधता को पूरी तरह से खो देगा. यूरोप में अमेरिका का सैन्य दबदबा खत्म हो जाएगा और रूस को अब अपनी सीमाओं पर किसी दुश्मन पश्चिमी सुरक्षा गुट का सामना नहीं करना पड़ेगा.
एक नए सुपर ब्लॉक का जन्म
यूरोप रूस गठबंधन यूरोपीय पूंजी, टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्री को रूस के तेल, गैस, खनिज और सैन्य शक्ति के विशाल भंडार के साथ मिला देगा. आपको बता दें कि अगर यह दोनों साथ हो जाते हैं तो यह ब्लॉक ग्रह पर सबसे शक्तिशाली आर्थिक और रणनीतिक शक्ति बन सकता है. इस गठबंधन से अमेरिकी वित्तीय दबदबा और चीनी मैन्युफैक्चरिंग शक्ति दोनों को ही चुनौती मिलेगी. इसके बाद ग्लोबल व्यापार, ऊर्जा बाजार और रक्षा संतुलन में काफी बदलाव आएगा.
संयुक्त राज्य अमेरिका को होगा सबसे बड़ा रणनीतिक नुकसान
अपने सबसे करीबी सहयोगी से कट जाने के बाद वाशिंगटन यूरोप, ग्लोबल संस्थानों और यहां तक की इंडो पेसिफिक के कुछ हिस्सों पर भी अपना प्रभाव खो देगा. इतना ही नहीं बल्कि अगर यूरोप रूस व्यापार यूरो, रूबल या किसी वैकल्पिक मुद्रा प्रणाली की तरफ शिफ्ट होता है तो डॉलर का ग्लोबल दबदबा भी कमजोर हो जाएगा.
कौन होगा सबसे ज्यादा ताकतवर
रूस यूरोप के लिए प्राइमरी सिक्योरिटी गारंटी और एनर्जी सप्लायर के तौर पर सामने आएगा. ग्लोबल डिप्लोमेसी पर मॉस्को का प्रभाव बढ़ेगा, जिस वजह से रूसी लीडरशिप को इंटरनेशनल फैसले लेने में आवाज मिलेगी. यूरोप को अमेरिकी प्रभाव से आजादी मिल जाएगी लेकिन इसकी भी एक कीमत चुकानी होगी. दरअसल जिस तरफ जर्मनी और फ्रांस आर्थिक इंजन बने रहेंगे यूरोपीय सुरक्षा और एनर्जी के लिए रूस पर निर्भर हो सकता है.
अमेरिकी दबदबे की जगह बनेगी मल्टीपोलर दुनिया
अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे बड़ा बदलाव पूरी तरह से मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर में बदलाव होगा. पावर अब वाशिंगटन तक ही सीमित नहीं होगी. इसके बजाय पावर के कई केंद्र यूरोप रूस, अमेरिका, चीन और उभरते हुए खिलाड़ी होंगे.
लेकिन क्या है इसके पीछे की वजह
दरअसल डोनाल्ड ट्रंप के यूक्रेन रूस युद्ध को समाप्त करने के लिए एक तरफ शांति योजना पर आगे बढ़ने से यूरोपीय देश नाराज हैं. इतना ही नहीं बल्कि हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को हथियाने की बार-बार की जा रही मांग और दबाव ने भी यूरोपीय देशों को भड़का दिया है. इसी बीच इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ने भी यह खुलकर कहा है कि यूरोप के लिए रूस के साथ सीधे बातचीत शुरू करने का समय आ चुका है. उन्होंने ऐसा कहा है कि यूरोप को अपनी स्वतंत्र भूमिका निभानी चाहिए क्योंकि सिर्फ एक पक्ष से बात करने से शांति नहीं होगी.
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