देश के प्रधानमंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त और चाक-चौबंद होती है. यदि कभी वीवीआईपी की सुरक्षा में तैनात एसपीजी, एनएसजी या पुलिस कमांडो किसी संदिग्ध व्यक्ति को हमले की स्थिति में ढेर कर देते हैं, तो इसको लेकर देश में बहुत ही स्पष्ट और कड़े कानून बनाए गए हैं. आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में क्या सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ सीधे हत्या का केस दर्ज हो सकता है या उन्हें कानूनन विशेष छूट मिलती है. भारतीय न्याय संहिता और सुरक्षा प्रोटोकॉल में इस संबंध में पूरे नियम-कायदे तय हैं. ये नियम यह तय करते हैं कि किस परिस्थिति में की गई कार्रवाई को जायज ठहराया जाएगा और किस स्थिति में कानूनी जांच बिठाई जाएगी, आइए समझें.

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एफआईआर और संबंधित कानूनी धाराएं

यदि किसी परिस्थिति में यह पाया जाता है कि वीवीआईपी सुरक्षाकर्मियों द्वारा किया गया बल प्रयोग पूरी तरह से गैर-जरूरी या कानून के खिलाफ था, तो उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकता है. ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 या फिर धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत एफआईआर दर्ज करने का प्रावधान मौजूद है. हालांकि, यह केस तभी दर्ज होता है जब शुरुआती साक्ष्यों से यह लगे कि मौके पर कोई ऐसा तात्कालिक खतरा मौजूद नहीं था जिससे गोली चलाने की नौबत आए.

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आत्मरक्षा और सरकारी कर्तव्य का अधिकार

भारतीय न्याय संहिता की धारा 96 से 106 के प्रावधानों के तहत देश में हर नागरिक और विशेष रूप से ड्यूटी पर तैनात सुरक्षा अधिकारियों को अपनी और दूसरों की जान बचाने के लिए आत्मरक्षा का पूरा हक हासिल है. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पर किसी भी प्रकार का हमला सीधे तौर पर देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला माना जाता है. ऐसे में यदि किसी व्यक्ति की ओर से वीवीआईपी की जान को तुरंत और बड़ा खतरा महसूस होता है, तो कमांडो द्वारा चलाई गई गोली को कानूनन ऑफिशियल ड्यूटी और आत्मरक्षा में उठाया गया कदम माना जाता है.

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कैसे चलाई जाती है जांच प्रक्रिया?

सामान्य पुलिस कार्रवाई के विपरीत, वीवीआईपी सुरक्षा में हुई किसी भी मौत के मामले में तुरंत सामान्य नागरिक की तरह कमांडो या सुरक्षाकर्मी की गिरफ्तारी नहीं की जाती है. इसके लिए सबसे पहले एक निष्पक्ष मजिस्ट्रेट या उच्च स्तरीय समिति द्वारा जांच बिठाई जाती है. जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि उस वक्त का माहौल कितना खतरनाक था. इसके अलावा, किसी भी सरकारी कर्मचारी पर आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए संबंधित सक्षम प्राधिकारी से कानूनी मंजूरी लेना अनिवार्य होता है, ताकि कोई बिना वजह सुरक्षा बलों को परेशान न कर सके.

फॉरेंसिक सबूत और कानूनी सुरक्षा के नियम

घटनास्थल से मिलने वाले सभी साक्ष्यों की जांच के लिए फॉरेंसिक और बैलिस्टिक टीमों को मौके पर बुलाया जाता है. कमांडो के हथियारों, गोलियों के खोल और घटना के समय की स्थिति की गहन वैज्ञानिक जांच की जाती है. यदि जांच में यह पूरी तरह साबित हो जाता है कि मारा गया व्यक्ति वास्तव में हमलावर था और उससे वीवीआईपी की जान को गंभीर खतरा था, तो सुरक्षाकर्मियों को गुड फेथ यानी नेक नीयत से की गई कार्रवाई का लाभ मिलता है. इस स्थिति में उनके खिलाफ किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई रोक दी जाती है.

ब्लू बुक और तय प्रोटोकॉल की पाबंदियां

देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा का पूरा ढांचा ब्लू बुक में दर्ज स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के आधार पर काम करता है. इस गाइडलाइन में स्पष्ट लिखा है कि वीवीआईपी के सबसे नजदीकी सुरक्षा घेरे में बिना इजाजत या संदिग्ध रूप से घुसने वाले व्यक्ति को सीधे तौर पर सुरक्षा में बड़ी सेंध माना जाएगा. ऐसे हालात में हमलावर को किसी भी प्रकार की चेतावनी दिए बिना सीधे न्यूट्रलाइज यानी ढेर करने की छूट कमांडोज के पास होती है, क्योंकि एक सेकेंड की देरी भी वीवीआईपी की जान के लिए घातक साबित हो सकती है.

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