Moon Gravity: अगर चांद पर एक ही ऊंचाई से हथोड़ा और पंख एक साथ गिराए जाएं तो दोनों बिल्कुल एक ही समय पर चांद की सतह से टकराएंगे. यह बात हैरान करने वाली लग सकती है क्योंकि हथौड़ा पंख से कहीं ज्यादा भारी होता है.

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यह फर्क तब समझ आता है जब हम यह जानते हैं कि ग्रेविटी और हवा का प्रतिरोध कैसे काम करते हैं. 

वे चांद पर एक साथ क्यों गिरते हैं? 

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चांद पर लगभग कोई वायुमंडल नहीं है. यानी गिरती हुई चीजों के रास्ते में रुकावट डालने के लिए कोई हवा ही नहीं है. पृथ्वी पर हवा का प्रतिरोध पंख की रफ्तार को धीमा कर देता है क्योंकि इसकी चौड़ी सतह आस-पास की हवा के साथ ज्यादा संपर्क में आती है. 

हथौड़े की बनावट सघन और ठोस होती है. इस वजह से उस पर हवा के प्रतिरोध का असर काफी कम होता है. यही वजह है कि पृथ्वी पर जब हथोड़ा और पंख एक ही ऊंचाई से गिराए जाते हैं तो हथौड़ा पंख के तुलना में जमीन पर काफी तेजी से पहुंचता है. लेकिन चांद पर यह विरोधी बल मौजूद नहीं होता. इस वजह से दोनों चीजों पर चांद की ग्रेविटी का असर एक ही दर से होता है.

क्या वजन गिरने की रफ्तार पर असर डालता है? 

जब हवा का प्रतिरोध ना हो तो ग्रेविटी से होने वाला त्वरण चीज के मास पर निर्भर नहीं करता. इसका मतलब है कि वैक्यूम में भारी हथौड़े और हल्के पंख पर ग्रेविटी का त्वरण एक जैसा ही होता है. चांद की ग्रेविटी पृथ्वी की तुलना में कमजोर है इस वजह से वहां चीज धीरे गिरती है. हालांकि उनके द्रव्यमान में फर्क होने के कारण कोई चीज दूसरी चीज की तुलना में तेजी से नहीं गिरती है.

गिरती हुई चीजों के बारे में गैलीलियो का विचार 

सदियों पहले वैज्ञानिक गैलीलियो ने यह विचार दिया था कि अगर हवा के प्रतिरोध के असर को हटा दिया जाए तो चीज अपने द्रव्यमान की परवाह किए बिना एक ही दर से गिरेगी. इस विचार ने पुरानी मान्यता को चुनौती दी कि भारी चीज स्वाभाविक रूप से तेजी से गिरती है. आधुनिक भौतिकी ने वैक्यूम की स्थिति में गैलीलियो के तर्क की पुष्टि की है.

अपोलो 15 प्रयोग

1971 में अपोलो 15 मिशन के दौरान चांद पर इस विचार को काफी प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया था. अंतरिक्ष यात्री डेविड स्कॉट ने चांद की सतह पर एक जियोलॉजिकल हथोड़ा और एक पंख एक साथ गिराया. क्योंकि पंख की रफ्तार को धीमा करने के लिए कोई भी वायुमंडल नहीं था इस वजह से दोनों चीज एक साथ गिरीं और एक ही समय पर चांद की जमीन पर पहुंची. 

इस प्रयोग ने एक सरल और देखने में प्रभावशाली उदाहरण पेश किया कि जब हवा का प्रतिरोध ना हो तो ग्रेविटी कैसे काम करती है. 

आइंस्टीन का सिद्धांत क्या कहता है? 

अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी जनरल रिलेटिविटी थ्योरी के जरिए इसे और बेहतर ढंग से समझाया. आइंस्टीन की थ्योरी में ग्रेविटी को सिर्फ एक खींचने वाली ताकत के तौर पर नहीं बल्कि मास और एनर्जी की वजह से स्पेस टाइम में आने वाले घुमाव के तौर पर समझाया गया है. 

ग्रेविटी के असर में चलने वाली चीज से इस मुड़े हुए स्पेस टाइम में जियोडेसिक कहे जाने वाले रास्ते पर चलती है. क्योंकि हथौड़े और पंख को एक ही जगह से और एक जैसे ग्रेविटी वाली स्थिति में छोड़ा जाता है इस वजह से उनके अलग-अलग मास के बावजूद उनकी रफ्तार पर एक जैसा असर पड़ता है. 

पृथ्वी पर नतीजा अलग क्यों होता है? 

पृथ्वी और चंद्रमा के बीच मुख्य अंतर वातावरण का है. पृथ्वी का वातावरण घना है इस वजह से नीचे गिरती चीजों को हवा के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है. पंख का सरफेस एरिया ज्यादा होने की वजह से हवा उस पर काफी उल्टा बल लगाती है. इससे वह धीरे-धीरे नीचे गिरता है. वहीं हथौड़े पर हवा के प्रतिरोध का असर कम होता है और वह काफी तेजी से नीचे गिरता है. चांद पर असल में कोई भी वातावरण है ही नहीं. इस वजह से पंख की रफ्तार को धीमा करने वाला हवा को कोई भी प्रतिरोध नहीं होता.

इस वजह से चंद्रमा पर हथौड़ा पंख से ज्यादा तेजी से नहीं गिरेगा. जब दोनों को एक ही स्थिति में एक साथ गिराया जाता है तो वह एक ही एक्सीलरेशन के साथ गिरते हैं और एक ही समय पर सतह से टकराते हैं.

यह आसान प्रयोग फिजिक्स के एक जरूरी सिद्धांत को दिखाता है. जब हवा का प्रतिरोध हटा दिया जाता है तो किसी चीज का मास या वजन यह तय नहीं करता कि वह ग्रेविटी के आसार में कितनी तेजी से गिरेगी.

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