US iran Conflict History: पिछले काफी समय से मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव चल रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई, मिसाइल हमले और परमाणु कार्यक्रम को लेकर टकराव ने पूरी दुनिया में चिंता बढ़ा दी है. वहीं हाल ही में स्ट्रेट ऑफ होमुर्ज के आसपास अमेरिका ने ईरानी मिसाइल लॉन्च साइट्स और सेल्फ डिफेंस स्ट्राइक की कार्रवाई की, जिसके बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने जवाबी कार्रवाई की धमकी दी. इन ताजा घटनाओं से अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह तनाव जल्दी खत्म होने वाला नहीं है. हालांकि इस तनाव के साथ ही कई बार यह सवाल भी उठा है कि आखिर अमेरिका और ईरान की दुश्मनी इतनी गहरी क्यों है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि 1979 से अब तक अमेरिका और ईरान की दुश्मनी कैसे बढ़ी और किस देश को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है.
1953 में सत्ता पलटने से शुरू हुई दुश्मनी
अमेरिका और ईरान के रिश्तों में तनाव की शुरुआत 1953 से मानी जाती है. उस समय अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान के निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक को सत्ता से हटाने में भूमिका निभाई थी. इसके बाद शाह मोहम्मद रजा पहलवी को मजबूत समर्थन मिला. ईरान में इसे विदेशी दखल माना गया और यही घटना आगे चलकर अमेरिकी विरोधी भावना की बड़ी वजह बनी. तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद गहराते गए.
1979 की इस्लामी क्रांति ने बदल दिए रिश्ते
1979 में आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई. शाह पहलवी को देश छोड़ना पड़ा और ईरान इस्लामी गणराज्य बन गया. क्रांति के बाद अमेरिका विरोध राजनीति का बड़ा हिस्सा बन गया. ईरान के नेताओं ने अमेरिका को ग्रेट शैतान कहना शुरू कर दिया और दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बिगड़ गए. इसी साल तेहरान ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकी नागरिकों और राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा गया. इस घटना को अमेरिका ने राष्ट्रीय अपमान माना, बंधक संकट के बाद दोनों देशों के राजनयिक रिश्ते लगभग खत्म हो गए और विश्वास की खाई लगातार बढ़ती गई.
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ईरान-इराक युद्ध में अमेरिका ने दिया इराक का साथ
1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध ने भी दोनों देशों की दुश्मनी को और गहरा किया. अमेरिका ने उस दौरान इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का समर्थन किया. युद्ध में लाखों लोग मारे गए और इसी दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर गंभीरता से काम शुरू किया. आगे चलकर यही परमाणु कार्यक्रम अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता बन गया. अमेरिका लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार बनाने की कोशिश का आरोप लगाता रहा, वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देश इसे सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं. 2015 में अमेरिका समेत कई देशों ने ईरान के साथ जेसीपीओए परमाणु समझौता किया था. हालांकि बाद में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इस समझौते से बाहर निकल गया और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए. इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया.
कासिम सुलेमानी की मौत के बाद बढ़ा तनाव
जनवरी 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था. इसके जवाब में ईरान ने इराक से स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए. इसके बाद मिडिल ईस्ट में लगातार ड्रोन रॉकेट और मिसाइली हमलो की घटनाएं सामने आती रही है.
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