Cm Bhagwant Mann Facing Akal Takht: पंजाब की राजनीति में इन दिनों बड़ी हलचल देखने को मिल रही है. सीएम भगवंत मान अपने मंत्रियों और विधायकों के साथ सिख धर्म की सर्वोच्च संस्था श्री अकाल तख्त साहिब के सामने पेश होकर अपना पक्ष रखेंगे. सीएम पर एक वीडियो विवाद को लेकर पंथ विरोधी होने का आरोप लगा है, साथ ही सरकार द्वारा सिखों की सलाह के बिना एक कानून पास करने की भी नाराजगी है. ऐसे में जिनको अकाल तख्त के बारे में नहीं पता है, उनके मन में यह सवाल उठता है कि यह संस्था आखिर कितनी ताकतवर होती है.
आस्था और इंसाफ की सबसे बड़ी अदालत अकाल तख्त
सरल शब्दों में समझें तो अकाल तख्त साहिब सिख समाज की सबसे बड़ी धार्मिक, सामाजिक और नैतिक अदालत है. अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थित यह तख्त सिखों के कुल पांच तख्तों में सबसे प्रमुख और सर्वोच्च माना जाता है. अकाल तख्त का सीधा अर्थ होका है- कभी न मिटने वाले ईश्वर का सिंहासन. इस संस्था का काम सिर्फ पूजा-पाठ या धार्मिक शिक्षा देना ही नहीं, बल्कि यह पूरे सिख समाज के लिए न्याय, राजनीति और सामाजिक मर्यादा से जुड़े हर छोटे-बड़े मामलों में अंतिम फैसला सुनाने का अधिकार रखती है.
क्या है अकाल तख्त का इतिहास?
अकाल तख्त का इतिहास बेहद गौरवशाली और संघर्ष से भरा रहा है. साल 1609 में सिखों के छठे गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद साहब ने इसकी स्थापना की थी. जब मुगल शासक जहांगीर ने सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी को शहीद करवा दिया था, तब गुरु हरगोबिंद साहिब ने मुगलों के जुल्म का बदला लेने के लिए इस तख्त की नींव रखी थी. उन्होंने जानबूझकर तख्त के चबूतरे को मुगल बादशाह के सिंहासन से भी ऊंचा बनवाया था, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि दुनिया के राजाओं की शक्ति से ऊपर अकाल ईश्वर का राज है.
मीरी और पीरी का सिद्धांत
अकाल तख्त की स्थापना के वक्त गुरु हरगोबिंद साहिब ने दो खास तलवारें धारण की थीं, जिनको मीरी और पीरी कहा जाता है. पीरी का मतलब होता है आध्यात्मिक या धार्मिक शक्ति, जबकि मीरी का अर्थ है सांसारिक या राजनीतिक ताकत. सिख धर्म का यह दर्शन सिखाता है कि धर्म और न्याय को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है.
कितना ताकतवर है अकाल तख्त?
अकाल तख्त की ताकत का अंदाजा इस बात से भी लग सकता है कि इसके आगे राजा और रंक सब एक समान हैं. इतिहास गवाह है कि जब सिखों के सबसे शक्तिशाली राजा महाराजा रणजीत सिंह से धार्मिक भूल हुई थी तो अकाल तख्त ने उनको भी तनखैया (दोषी) मानकर सजा सुनाई थी और महाराजा को उसे स्वीकार भी करना पड़ा था. आज के दौर की बात करें तो चाहे मुख्यमंत्री हों या कोई बड़ा नेता, अगर उनसे पंथ मर्यादा के खिलाफ कोई चूक होती है, तो उनको यहां आकर माफी मांगनी पड़ती है. इस तख्त की असली ताकत किसी सरकारी कानून या पुलिस से नहीं, बल्कि करोड़ों सिखों की आस्था से चलती है.
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