अमेरिका के टेनेसी राज्य में एक बेहद अजीब और चौंकाने वाला मामला सामने आया है. वहां करीब 200 साल बाद किसी महिला कैदी क्रिस्टा पाइक को मौत की सजा दी जा रही थी. क्रिस्टा को 1995 में अपनी सहपाठी की हत्या का दोषी पाया गया था. सजा देने के लिए उसे पेंटाबार्बिटल के दो जानलेवा इंजेक्शन लगाए गए. डॉक्टर और जेलकर्मी उसके मरने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन यह घातक दवा काम करने में पूरी तरह नाकाम रही और 50 साल की क्रिस्टा पाइक जिंदा बच गई. इस घटना ने एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि आखिर पेंटाबार्बिटल इंजेक्शन कैसे काम करता है और इसे दर्द रहित मौत का जरिया क्यों माना जाता है.

Continues below advertisement

पेंटाबार्बिटल दवा का वैज्ञानिक आधार

पेंटाबार्बिटल मुख्य रूप से बार्बिट्यूरेट श्रेणी की एक बेहद शक्तिशाली दवा है, जिसका असर सीधे इंसान के सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है. पुराने समय में चिकित्सा विज्ञान में इसका इस्तेमाल मरीजों को बेहोश करने या सर्जरी से पहले एनेस्थीसिया देने के लिए किया जाता था. हालांकि, अत्यधिक खतरनाक होने के कारण अब इसके सामान्य इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है. वर्तमान में अमेरिका के कुछ चुनिंदा राज्यों में इसका प्रयोग कैदियों को सजा-ए-मौत देने की कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाता है.

Continues below advertisement

शरीर के भीतर कैसे काम करता है यह इंजेक्शन?

वैज्ञानिक अध्ययनों और मेडिकल रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, इस जानलेवा इंजेक्शन में पेंटाबार्बिटल सोडियम के साथ-साथ प्रोपाइलीन ग्लाइकोल और अल्कोहल का मिश्रण मौजूद होता है. जब इसे सुई के जरिए नसों में पहुंचाया जाता है, तो यह रसायन मस्तिष्क के मुख्य संदेशवाहक न्यूरोट्रांसमीटर GABA की कार्यप्रणाली को पूरी तरह थाम देता है. न्यूरोट्रांसमीटर ही हमारे दिमाग से शरीर के बाकी हिस्सों तक संदेश पहुंचाते हैं. दवा का असर शुरू होते ही नसें और तंत्रिकाएं काम करना बंद करने लगती हैं, जिससे कैदी की सोचने-समझने की क्षमता और चेतना खत्म हो जाती है.

यह भी पढ़ें: Rahul Gandhi Security: राहुल गांधी की सुरक्षा पर हर दिन कितना पैसा खर्च होता है, देख लीजिए हिसाब-किताब?

रेस्पिरेटरी सिस्टम और दिल पर असर

जैसे ही दिमाग काम करना बंद करता है, इंसान सबसे पहले गहरे अचेतन अवस्था यानी बेहोशी में चला जाता है. इसके ठीक बाद यह दवा फेफड़ों और रेस्पिरेटरी सिस्टम पर हमला बोलती है. सांस लेने की प्रक्रिया धीरे-धीरे रुकने लगती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरने लगता है. मस्तिष्क तक ऑक्सीजन न पहुंचने और नर्वस सिस्टम के पूरी तरह ठप हो जाने के कारण अंत में दिल की धड़कन रुक जाती है. ऑक्सीजन की भारी कमी और कार्डियक अरेस्ट की वजह से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है.

इसे पेनलेस क्यों माना जाता है?

पेंटाबार्बिटल को पेनलेस यानी दर्द रहित इंजेक्शन कहने की सबसे बड़ी वजह इसकी काम करने की क्रमिक शैली है. जब इसकी भारी मात्रा शरीर में इंजेक्ट की जाती है, तो इसका सबसे पहला हमला दिमाग पर होता है, जिससे व्यक्ति सेकंडों में बेहोश हो जाता है. जब तक फेफड़े या दिल काम करना बंद करते हैं, तब तक कैदी पूरी तरह अचेत हो चुका होता है और उसे किसी भी तरह के शारीरिक दर्द या घुटन का एहसास नहीं होता. हालांकि, डॉक्टरों का मानना है कि इसके सही असर के लिए दवा की सटीक खुराक और उसका सही नस में पहुंचना बेहद जरूरी होता है.

प्रक्रिया में चूक और तकनीकी खामियां

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इंजेक्शन लगाते समय कोई गलती हो जाए या दवा सही नस में प्रविष्ट न हो, तो कैदी को असहनीय दर्द का सामना करना पड़ सकता है. पूर्व में भी अमेरिका के कुछ मामलों में सुई लगाने की प्रक्रिया के दौरान परेशानियां देखने को मिली थीं. लेकिन क्रिस्टा पाइक के केस में दो-दो पूरे इंजेक्शन लगने के बाद भी जीवित बच जाना अपने आप में बेहद दुर्लभ और हैरान करने वाली घटना है. माना जा रहा है कि दवा की गुणवत्ता, नस की स्थिति या शरीर की किसी खास प्रतिक्रिया की वजह से यह घातक दवा बेअसर हो गई होगी.

यह भी पढ़ें: विमान पर गिरे बिजली तो कैसे सुरक्षित रहते हैं यात्री, कैसे काम करता है फैराडे सिद्धांत?