देश की संसद में बैठने वाले जनप्रतिनिधि आखिर कितनी तनख्वाह पाते हैं? क्या राज्यसभा सांसद की सैलरी लोकसभा सांसद से अलग होती है, या दोनों को बराबर भुगतान मिलता है? अक्सर सोशल मीडिया पर सांसदों के वेतन और सुविधाओं को लेकर तरह-तरह की बातें सामने आती रहती हैं, लेकिन असल सच क्या है? 1 अप्रैल 2023 से लागू नए संशोधनों के बाद सांसदों की सैलरी और भत्तों में बदलाव हुआ है. आइए समझते हैं.
क्या राज्यसभा और लोकसभा सांसद की सैलरी अलग है?
सबसे पहले यह साफ कर लें कि राज्यसभा और लोकसभा सांसदों की मूल सैलरी में कोई अंतर नहीं है. दोनों सदनों के सदस्यों को समान वेतन मिलता है. 1 अप्रैल 2023 से लागू संशोधन के बाद प्रत्येक सांसद को लगभग 1,24,000 रुपये से 1,25,000 रुपये प्रति माह मूल वेतन दिया जाता है. इससे पहले यह राशि 1,00,000 रुपये थी, जिसमें करीब 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई. यानि वेतन के मामले में राज्यसभा और लोकसभा सांसद बराबरी पर हैं. किसी को कम या ज्यादा नहीं मिलता है.
सैलरी के अलावा कौन-कौन से भत्ते मिलते हैं?
मूल वेतन के अलावा सांसदों को कई तरह के भत्ते भी मिलते हैं. संसद सत्र के दौरान या किसी आधिकारिक बैठक में शामिल होने पर उन्हें 2,500 रुपये प्रतिदिन का दैनिक भत्ता दिया जाता है. यह भत्ता केवल उन दिनों के लिए मिलता है जब सांसद कार्यवाही में हिस्सा लेते हैं. इसके अलावा कार्यालय खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये मिलते हैं. इसमें लगभग 50,000 रुपये स्टाफ के वेतन के लिए और 25,000 रुपये स्टेशनरी व अन्य कार्यालयी जरूरतों के लिए तय होता है.
लोकसभा सांसदों को अपने क्षेत्र के कामकाज के लिए क्षेत्रीय भत्ता भी मिलता है, जो लगभग 87,000 रुपये प्रति माह है. यह राशि क्षेत्र में जनसंपर्क और प्रशासनिक गतिविधियों पर खर्च की जाती है.
आवास, यात्रा और अन्य सुविधाएं
सांसदों को दिल्ली में सरकारी आवास की सुविधा दी जाती है. चाहें तो वे बंगला ले सकते हैं या फिर घर भत्ता का विकल्प चुन सकते हैं. इसके अलावा उन्हें साल में 34 मुफ्त हवाई यात्राओं की सुविधा मिलती है. रेल यात्रा में फर्स्ट क्लास की सुविधा भी उपलब्ध होती है. स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो सांसद और उनके परिवार को CGHS योजना के तहत मुफ्त इलाज मिलता है. बिजली और पानी की भी निश्चित सीमा तक मुफ्त सुविधा दी जाती है.
वेतन तय कैसे होता है?
सांसदों का वेतन संसद द्वारा पारित कानून के तहत तय होता है. समय-समय पर इसमें संशोधन किया जाता है. 2023 में हुई बढ़ोतरी भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थी. सरकार महंगाई और अन्य आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए बदलाव करती है.
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