बोर्ड ऑफ पीस में कितने देश, संयुक्त राष्ट्र से कितना ताकतवर यह संगठन?
गाजा संकट के बीच एक नया वैश्विक मंच सामने आया है, जिसका नाम है बोर्ड ऑफ पीस. ऐसा दावा है कि यह संयुक्त राष्ट्र को भी चुनौती दे सकता है. अब सवाल है कि क्या यह वाकई दुनिया की ताकत की दिशा बदल पाएगा?

गाजा संकट के बीच एक नई वैश्विक पहल ने दुनिया की राजनीति में हलचल मचा दी है. दावा है कि यह मंच संयुक्त राष्ट्र जैसी बड़ी संस्था को भी चुनौती दे सकता है. नाम है ‘बोर्ड ऑफ पीस’. इसकी पहली बैठक में करीब 50 देशों ने हिस्सा लिया और भारत भी वहां मौजूद रहा, लेकिन सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूद रहा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर यह संगठन कितना बड़ा है और क्या वाकई यह संयुक्त राष्ट्र से ज्यादा ताकतवर बन सकता है?
गाजा संकट से निकला नया मंच
विश्व आर्थिक मंच की दावोस बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने गाजा में शांति स्थापित करने के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की रूपरेखा पेश की थी. उस वक्त उन्होंने कहा था कि यह मंच वैश्विक शांति प्रयासों को नई दिशा देगा और भविष्य में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को भी चुनौती दे सकता है. इसी पहल के तहत पहली औपचारिक बैठक वॉशिंगटन डीसी में आयोजित की गई. बैठक का आयोजन United States Institute of Peace में हुआ. इसमें लगभग 50 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.
कितने देश हैं इसके सदस्य?
बैठक में शामिल देशों में से 27 को इस बोर्ड का औपचारिक सदस्य बताया गया. इन सदस्य देशों में अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं. भारत इस संगठन का सदस्य नहीं है, लेकिन उसने पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया. वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास की प्रभारी राजनयिक नामग्या खम्पा ने बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया.
भारत को इस मंच से जुड़ने का निमंत्रण मिला था, लेकिन विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि प्रस्ताव पर अभी विचार चल रहा है. यानी भारत ने अभी औपचारिक सदस्यता पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है.
संयुक्त राष्ट्र से कितना अलग है ढांचा?
‘बोर्ड ऑफ पीस’ की संरचना पारंपरिक बहुपक्षीय संस्थाओं से काफी अलग बताई जा रही है. संयुक्त राष्ट्र में बड़े फैसलों के लिए व्यापक सहमति की जरूरत होती है और सुरक्षा परिषद में वीटो जैसी व्यवस्था भी मौजूद है. इसके उलट, इस नए बोर्ड में फैसले लेने की प्रक्रिया ज्यादा केंद्रीकृत मानी जा रही है. प्रस्तावित ढांचे के अनुसार, Donald Trump को इसका आजीवन अध्यक्ष बनाया गया है और उन्हें व्यापक निर्णय लेने के अधिकार दिए गए हैं.
इसका आर्थिक मॉडल भी अलग है. स्थायी सदस्यता चाहने वाले देशों को एक अरब डॉलर तक का योगदान देना होगा. इससे यह संगठन संसाधनों के मामले में काफी मजबूत हो सकता है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की फंडिंग सदस्य देशों के तय योगदान पर आधारित होती है और अक्सर बजट को लेकर विवाद भी होते हैं.
क्या सच में संयुक्त राष्ट्र को चुनौती?
फिलहाल ‘बोर्ड ऑफ पीस’ एक उभरता हुआ मंच है, जबकि United Nations 1945 से वैश्विक स्तर पर काम कर रहा है और उसके 190 से ज्यादा सदस्य देश हैं. ऐसे में आकार, अनुभव और वैश्विक मान्यता के लिहाज से संयुक्त राष्ट्र अभी भी कहीं ज्यादा व्यापक संस्था है.
हालांकि, यह साफ है कि नई पहल ने वैश्विक कूटनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि कितने देश औपचारिक रूप से इससे जुड़ते हैं और क्या यह मंच वाकई अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों में कोई बड़ा बदलाव ला पाता है.
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Source: IOCL

























