Biogas Production: एलपीजी की बढ़ती कीमतों और सस्टेनेबल एनर्जी सोर्स में बढ़ती दिलचस्पी की वजह से कई परिवार खाना पकाने के लिए एलपीजी के विकल्प के तौर पर बायोगैस को अपना रहे हैं. बायोगैस प्लांट गाय के गोबर और किचन से निकलने वाले ऑर्गेनिक कचरे को मीथेन युक्त गैस में बदलते हैं. इसका इस्तेमाल रोजाना खाना पकाने में किया जा सकता है. आइए जानते हैं कि बायोगैस को बनाने में कितना समय लगता है और इससे कितने पैसे की बचत हो सकती है.
बायोगैस बनाने में कितना समय लगता है?
जब पहली बार बायोगैस प्लांट लगाया जाता है तो यह तुरंत गैस बनना शुरू नहीं करता है. सबसे पहले डाइजेस्टर टैंक को गाय के गोबर और पानी से बने घोल से भरना पड़ता है. इसके बाद प्राकृतिक रूप से मौजूद बैक्टीरिया बिना ऑक्सीजन वाले माहौल में ऑर्गेनिक चीजों को तोड़ना शुरू करते हैं. मीथेन का उत्पादन शुरू होने से पहले इस बायोलॉजिकल प्रोसेस में समय लगता है. सामान्य हालातों में इस्तेमाल लायक बायोगैस का पहला बैच 15 से 30 दिनों के अंदर तैयार हो जाता है. कुछ मामलों में खासकर ठंड के मौसम में इस प्रक्रिया में 35 दिन का समय लग सकता है.
शुरुआत के बाद रोजाना गैस का उत्पादन
एक बार जब बैक्टीरिया की गतिविधि स्थिर हो जाती है और प्लांट पूरी तरह से काम करने लगता है तो बायोगैस का उत्पादन रोज होता रहता है. जब तक सिस्टम में लगातार ताजा गाय का गोबर या फिर किचन का कचरा डाला जाता है तब तक हर दिन गैस बनाई जा सकती है.
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एलपीजी की तुलना में बायोगैस की लागत
बायोगैस का सबसे बड़ा फायदा इसकी काफी कम ऑपरेटिंग लागत है. एक परिवार आमतौर पर एक एलपीजी सिलेंडर के लिए ₹800 से ₹1100 के बीच खर्च करता है. इसके उलट बायोगैस में गाय के गोबर और सब्जियों के कचरे जैसे कच्चे माल का इस्तेमाल होता है. यह आसानी से मौजूद और लगभग फ्री ही होता है. एक बार प्लांट चालू हो जाने के बाद रोज ईंधन की लागत लगभग शून्य हो जाती है.
शुरुआती निवेश और सरकारी सब्सिडी
प्लांट के साइज और डिजाइन के आधार पर सेटअप का खर्चा आमतौर पर ₹3000 से ₹25000 के बीच होता है. हालांकि सरकारी सब्सिडी प्रोग्राम इस बोझ को काफी कम कर सकते हैं. बायोगैस के कई मॉडल ₹12000 से ₹20000 तक की सब्सिडी के लिए योग्य हैं.
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