पिछले करीब 150 सालों से पूरी दुनिया बिजली बनाने के लिए एक ही तरीका अपनाती आ रही है. पहले पानी को गर्म किया जाता है, फिर उससे भाप (Steam) बनाई जाती है, वह भाप टर्बाइन घुमाती है और टर्बाइन से बिजली पैदा होती है. चाहे कोयले का पावर प्लांट हो, न्यूक्लियर हो या थर्मल पावर स्टेशन सबकी नींव भाप (Steam) पर ही टिकी रही. हालांकि, अब चीन ने इस सोच को पूरी तरह उलट दिया है.
चीन ने साबित कर दिया है कि बिजली बनाने के लिए न भाप जरूरी है, न पानी, बल्कि अब कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) से और वो भी ज्यादा कुशल तरीके से बिजली बन सकती है. यह कोई प्रयोगशाला का एक्सपेरिमेंट नहीं है. यह तकनीक अब असली फैक्ट्री में, असली ग्रिड से जुड़कर बिजली बना रही है. तो आइए जानते हैं कि कार्बन डाई ऑक्साइड से कैसे बिजली बनती है, चीन ने कैसे बिजली बनाने की 150 साल पुरानी तकनीक बदल दी.
कार्बन डाई ऑक्साइड से कैसे बिजली बनती है
चीन ने दुनिया का पहला व्यावसायिक सुपरक्रिटिकल CO₂ पावर प्लांट शुरू किया है, जिसका नाम Super Carbon-1 है. यह प्लांट चीन के शौगांग सिचुआंग स्टील प्लांट में लगाया गया है. सुपरक्रिटिकल CO₂, जब किसी गैस को बहुत ज्यादा तापमान और दबाव पर ले जाया जाता है, तो वह न पूरी तरह गैस रहती है और न पूरी तरह तरल, इस खास तरीके को Supercritical State कहते हैं. इसमें CO₂ बहुत ज्यादा एनर्जी पकड़ सकती है, तेजी से घूम सकती है और टर्बाइन को ज्यादा कुशल तरीके से घुमा सकती है.
स्टील फैक्ट्री की बेकार गर्मी अब बनेगी बिजली
चीन के Shougang Sichuan Steel Plant में यह तकनीक पहली बार व्यावसायिक स्तर पर लगाई गई है. स्टील फैक्ट्रियों में 700°C तक की भयानक गर्मी निकलती है, जो अब तक हवा में उड़ जाती थी या बस बेकार चली जाती थी. अब उसी वेस्ट हीट (बेकार गर्मी) से CO₂ को सुपरक्रिटिकल बनाया जा रहा है और उससे सीधे बिजली पैदा हो रही है. इसका मतलब यह है कि हर स्टील फैक्ट्री, सीमेंट प्लांट या रिफाइनरी एक मिनी पावर स्टेशन बन सकती है.
भाप और CO₂ में फर्क कितना बड़ा है?
भाप और सुपरक्रिटिकल CO₂ सिस्टम के बीच फर्क सिर्फ तकनीक का नहीं, पूरी सोच का फर्क है. पारंपरिक Steam सिस्टम में पहले पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है, जिसमें बहुत सारा पानी लगता है, टर्बाइन बड़े होते हैं और गर्मी का बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है, इसलिए कुल दक्षता करीब 40 प्रतिशत ही रह जाती है.
वहीं चीन का Supercritical CO₂ सिस्टम उसी गर्मी का यूज सीधे कार्बन डाइऑक्साइड को सुपरक्रिटिकल अवस्था में लाकर करता है, जहां CO₂ न तो पूरी गैस होती है न तरल, बल्कि एनर्जी को बहुत कुशल तरीके से टर्बाइन तक पहुंचाती है. इस वजह से टर्बाइन 80 प्रतिशत तक छोटे बनते हैं, पानी की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती, रखरखाव कम होता है और दक्षता 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा पहुंच जाती है.
15 मेगावॉट का सिस्टम और पूरा बिजनेस मॉडल
चीन में लगाया गया यह सिस्टम करीब 15 मेगावॉट बिजली बना रहा है. इसमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह सिस्टम 3 से 5 साल में अपनी पूरी लागत निकाल लेता है और उसके बाद सीधा मुनाफा, यहीं से एक बड़ा बदलाव शुरू होता है.
Carbon Capture अब घाटे का सौदा नहीं रहेगा
अब तक Carbon Capture को लोग महंगा, नुकसान वाला और सिर्फ पर्यावरण के लिए जरूरी बोझ मानते थे. लेकिन जब CO₂ से बिजली बने, फैक्ट्री की बेकार गर्मी कमाई करने लगे, बिजली सीधे ग्रिड में जाए. तो Carbon Capture एक profit-making business बन सकता है.
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