Mughal Games: स्मार्टफोन, टेलीविजन और इंटरनेट के रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनने से सदियों पहले मुगल साम्राज्य में मनोरंजन का तरीका काफी अलग था. मुगल बादशाहों के लिए फुर्सत का समय सिर्फ आराम करने का जरिया नहीं था. यह अपनी बुद्धिमानी, सैन्य रणनीति, शारीरिक कौशल और शाही शान-ओ-शौकत दिखाने का भी एक तरीका था. बड़े साइज के बोर्ड गेम और हाथ से पेंट किए गए ताश के पत्तों से लेकर शतरंज, पोलो और कबूतर उड़ाने तक मुगलों के पास कई तरह की गतिविधि थी जिनमें शासक और दरबारी दोनों ही व्यस्त रहते थे.
चौपड़
मुगलों के पसंदीदा इनडोर खेलों में से एक था चौपड़. इसे चौसर भी कहा जाता है. यह एक पारंपरिक भारतीय बोर्ड गेम है. बादशाह अकबर को यह खेल इतना पसंद था कि उन्होंने फतेहपुर सीकरी में एक विशाल चौपड़ कोर्ट बनवाया था.
अकबर के वर्जन की खासियत यह थी कि लकड़ी के मोहरों के बजाय वह शाही हरम की महिलाओं का इस्तेमाल करते थे जो अलग-अलग रंगों के कपड़े पहने होती थीं. वे पास फेंकने के हिसाब से बड़े बोर्ड पर चलती थीं, जिससे यह खेल एक आम मनोरंजन के बजाय एक शानदार शाही आयोजन बन जाता था.
गंजीफा
मनोरंजन का एक और लोकप्रिय तरीका था गंजीफा. यह ताश का एक खेल था जिसे मुगल फारस से भारत लाए थे. आज के आयताकार ताश के पत्तों के गंजीफा के पत्ते गोल होते थे और अक्सर हाथ से बनाए जाते थे.
शाही परिवार के सदस्यों के लिए ये पत्ते कुशल कारीगर हाथीदांत, कछुए की खाल और चंदन जैसी महंगी चीजों पर सोने और चांदी के रंगों का इस्तेमाल करके पेंट करते थे. यह खेल मुगल हरम की महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय था, जो मनोरंजन और साथ-साथ समय बिताने के लिए इसे नियमित रूप से खेलती थीं.
शतरंज
मुगल शतरंज के भी काफी ज्यादा शौकीन थे. इसे सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि रणनीतिक सोच और सैन्य योजना बनाने की एक कसरत माना जाता था. बादशाह, राजकुमार और सैन्य कमांडर अक्सर अपने फैसले लेने की क्षमता को तेज करने और युद्ध के मैदान की चाल को समझने के लिए शतरंज खेलते थे. योजना बनाने और दूर की सोचने पर जोर देने वाले इस खेल ने इसे शासक वर्ग के बीच काफी पसंदीदा बना दिया था.
पोलो
जब आउटडोर खेलों की बात आती थी तो मुगल संस्कृति में पोलो का एक खास स्थान था. मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने इस खेल को बढ़ावा दिया और जल्द ही यह शाही दरबार की पसंदीदा मनोरंजक गतिविधि में से एक बन गया. घोड़े पर खेले जाने वाले पोलो खेल के लिए तेजी, तालमेल और बेहतरीन घुड़सवारी कौशल की जरूरत होती थी. वक्त के साथ राजस्थान जैसे इलाकों में हाथी पर खेला जाने वाला पोलो मशहूर हुआ.
कबूतर बाजी
मुगल बादशाहों के सबसे अनोखे शौक में से एक था कबूतर बाजी यानी कि कबूतर उड़ाना. इसे अकबर ने इश्कबाजी का नाम दिया था. इतिहास से यह पता चलता है कि अकबर के पास लगभग 20000 खास नस्ल के कबूतर थे. इनमें से कई कबूतरों को हवा में कलाबाजी खाने और एक साथ मिलकर उड़ने जैसे करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित किया गया था. उनके बाद के शासकों जहांगीर और शाहजहां को भी मनोरंजन के तौर पर कबूतर पालने और उन्हें प्रशिक्षित करने में गहरी दिलचस्पी थी.
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शिकार और जानवरों के खेल
बोर्ड गेम्स और खेल के अलावा शिकार मुगलों के सबसे प्रतिष्ठित शौक में से एक था. शाही शिकार अभियान में अक्सर प्रशिक्षित बाजों का इस्तेमाल किया जाता था. इससे बादशाह और रईस के बीच बाज से शिकार करने की कला एक पसंदीदा शौक बन गई.
इसी के साथ मुगल दरबार में कुश्ती के मुकाबले देखना और हाथी, तीतर व दूसरे जानवरों के बीच मुकाबले आयोजित करना भी पसंद किया जाता था. इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते थे.
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