Rain Prediction: सेटेलाइट्स, वेदर एप्लीकेशन और रडार सिस्टम के आने से काफी पहले लोग बारिश का अंदाजा लगाने के लिए खुद प्रकृति पर ही निर्भर रहते थे. किसान, नाविक और गांव के लोग आसमान, जानवर, हवा और यहां तक कि पौधों को भी काफी ध्यान से देखते थे ताकि आने वाले मौसम में होने वाले बदलाव को समझ सकें. यह पारंपरिक तरीके पीढ़ियों से चले आ रहे थे.

Continues below advertisement

बादलों की भाषा को समझना

सबसे आम तरीकों में से एक था बादलों को देखना. गहरे, नीचे लटके हुए बादलों को आने वाली बारिश का एक साफ संकेत माना जाता था. ठीक इसी तरह छोटे-छोटे सफेद बादलों के झुंड जो अक्सर बकरी की पीठ जैसे दिखते थे, मौसम के मिजाज में बदलाव और आने वाले समय में संभावित बारिश का संकेत देते थे. 

Continues below advertisement

जानवरों का व्यवहार 

जानवर अक्सर इंसानों के नोटिस करने से पहले ही पर्यावरण में होने वाले बदलाव पर प्रतिक्रिया देते हैं. चींटियों का अपने अंडों को ऊंची जगह पर ले जाना आने वाली बारिश का संकेत माना जाता था. मेंढक भी अपनी पूरी भूमिका निभाते थे. बारिश के आने से पहले उनकी टर्र टर्र की आवाज तेज हो जाती थी.

चांद और आसमान से मिलने वाले संकेत 

चांद के चारों तरफ बना घेरा वातावरण में नमी का संकेत देता था. इससे यह अंदाजा लगाया जाता था कि एक या फिर दो दिन में बारिश हो सकती है. आसमान का रंग भी काफी मायने रखता था. शाम के वक्त आसमान का लाल होना आगे मौसम साफ रहने का संकेत देता था. इसी तरह सुबह के समय आसमान का लाल होना खराब मौसम या फिर बारिश की चेतावनी माना जाता था. 

हवा की दिशा 

लोग हवा में होने वाले बदलाव पर भी निर्भर रहते थे. बारिश के ठीक पहले उठने वाली मिट्टी की सौंधी महक बढ़ती हुई नमी एक मजबूत संकेत थी. भारत के कई हिस्सों में पूरब दिशा से चलने वाली ठंडी हवा को बारिश लाने वाला माना जाता था.

पेड़ पौधों से मिलने वाले संकेत 

पेड़ पौधे भी संकेत देते थे. पलाश के पेड़ों पर भारी मात्रा में फूल खिलने को पारंपरिक रूप से अच्छे मानसून के मौसम से जोड़ा जाता था. इसी तरह पत्तियों का मुड़ना या फिर पौधों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलाव आने वाली बारिश का संकेत देते थे.

यह भी पढ़ें: देश के इन राज्यों में अब तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई बीजेपी, यहां देख लें लिस्ट