ईरान में हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं. सड़कों पर उतरी जनता, सुरक्षा बलों की सख्ती और बढ़ती मौतों के बीच अमेरिका की चेतावनियों ने पूरे मिडिल ईस्ट को बेचैन कर दिया है. मिसाइल और एयरस्ट्राइक की बातें तो आम हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका वाकई जमीन के रास्ते ईरान में घुस सकता है? क्या यह उतना आसान है जितना नक्शे पर दिखता है, या इसके पीछे कई ऐसी मजबूरियां हैं जो इस विकल्प को बेहद जोखिम भरा बना देती हैं?

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ईरान में हालात क्यों बने तनावपूर्ण?

ईरान में बीते कुछ हफ्तों से सरकार विरोधी आंदोलन तेज हो गया है. देश के 31 प्रांतों में अब तक 500 से ज्यादा प्रदर्शन दर्ज किए जा चुके हैं. इन प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों और हिंसा में 646 से अधिक लोगों की मौत की खबर है. हालात पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान में दमन जारी रहा, तो अमेरिका ऐसा हमला कर सकता है, जिसकी कल्पना तेहरान ने भी नहीं की होगी.

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जमीन के रास्ते हमला क्यों सबसे मुश्किल?

किसी भी देश पर जमीनी हमला करना सबसे कठिन सैन्य विकल्प माना जाता है. ईरान का भौगोलिक स्वरूप इसे और जटिल बना देता है. ईरान चारों तरफ से पहाड़ों, रेगिस्तानों और कठिन इलाकों से घिरा हुआ है. यहां सैनिकों की बड़ी संख्या को ले जाना, सप्लाई लाइन बनाए रखना और लंबे समय तक टिके रहना किसी भी विदेशी सेना के लिए भारी चुनौती है.

पड़ोसी देशों का समीकरण

अगर अमेरिका जमीन के रास्ते ईरान में घुसना चाहे, तो उसे पड़ोसी देशों की मदद चाहिए होगी. ईरान की सीमा इराक, तुर्किए, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अजरबैजान और तुर्कमेनिस्तान से लगती है. इनमें से कोई भी देश खुलकर अमेरिकी जमीनी हमले का समर्थन करता नहीं दिखता है. इराक पहले ही अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से असहज है. पाकिस्तान और तुर्किए भी ऐसे किसी संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहते हैं. ऐसे में जमीन के रास्ते हमला लगभग असंभव हो जाता है.

खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ताकत

हालांकि हवा और समुद्र के रास्ते अमेरिका की स्थिति काफी मजबूत है. खाड़ी देशों में उसके कई बड़े सैन्य अड्डे पहले से मौजूद हैं. कुवैत में अली अल सलेम एयर बेस और कैंप आरिफजान स्थित हैं, जिसे अमेरिकी सेना का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक बेस माना जाता है. कुवैत ईरान से करीब 250 किलोमीटर दूर है. संयुक्त अरब अमीरात में अल धफरा एयर बेस है, जहां एफ-35 और एफ-22 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तैनात हैं. यह ईरान से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर है.

कतर और बहरीन की भूमिका

कतर का अल उदीद एयर बेस मिडिल ईस्ट में अमेरिका का सबसे अहम सैन्य अड्डा है. यहां 10 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और यही अमेरिकी सेंटकॉम का मुख्यालय भी है. यह ईरान से करीब 350 किलोमीटर दूर है. बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है, जो फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना की ताकत का केंद्र है. ईरान से इसकी दूरी लगभग 250 किलोमीटर है. 

ईरान की जमीनी ताकत

ईरान की थल सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की संख्या लाखों में है. देश के अंदर मजबूत मिलिशिया नेटवर्क और स्थानीय समर्थन भी मौजूद है. यही वजह है कि जमीनी युद्ध अमेरिका के लिए लंबा, महंगा और राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है.

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