Sea Direction: जीपीएस जैसे आधुनिक नेविगेशन सिस्टम के आने से काफी पहले नाविक सिर्फ अपनी नजर, अनुभव और आसान औजारों का इस्तेमाल करके बड़े-बड़े महासागरों को पार कर लेते थे. पुराने जमाने में खुले समुद्र में रास्ता खोजने के लिए प्रकृति, आसमान और हवा पानी की गहरी समझ की जरूरत होती थी. टेक्नोलॉजी की कमी के बावजूद यह तरीके हैरानी की बात है काफी सटीक होते थे.
सूरज और तारों का इस्तेमाल
पुराने जमाने के नाविकों के लिए आसमान सबसे भरोसेमंद गाइड होता था. दिन के समय वे सूरज की स्थिति को देखकर दिशा का अंदाजा लगाते थे. दोपहर के समय सबसे छोटी परछाई उत्तर दक्षिण दिशा बताती थी. रात में नॉर्थन हेमिस्फीयर के नाविक ध्रुव तारे पर भरोसा करते थे. यह तारा आसमान में लगभग एक जगह पर टिका रहता था और हमेशा उत्तर दिशा दिखाता था. वे तारों के समूहों को भी याद कर लेते थे और लंबी दूरी तय करते समय दिशा और जगह को समझने के लिए उनकी चाल पर नजर रखते थे.
आसपास के माहौल की समझ
जब बादलों या फिर तूफानों की वजह से आसमान दिखाई नहीं देता था तब नाविक प्राकृतिक संकेत का सहारा लेते थे. समुद्री पक्षी इसमें बड़ी भूमिका निभाते थे. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके उड़ने का तरीका अक्सर जमीन की दिशा बता देता था. समुद्र की लहर और धाराएं भी संकेत देती थीं. अनुभवी नाविक लहरों की दिशा और पानी के रंग में आए बदलावों को देखकर अपने रास्ते का अंदाजा लगा लेते थे. हवा का मिजाज लंबी दूरी की यात्राओं में रास्ता दिखाने का एक और जरूरी जरिया था.
शुरुआती नेविगेशन औजार
समय के साथ नाविकों ने और ज्यादा सटीक नतीजे पाने के लिए कई औजार बनाए. पुराने भारत में मत्स्य यंत्र नाम का एक औजार इस्तेमाल होता था. यह कंपास का ही एक शुरुआती रूप था. बाद में जब चुंबकीय कंपास का आविष्कार हुआ तो नेविगेशन काफी आसान हो गया. एस्ट्रोलैब और सेक्स्टैंट जैसे दूसरे औजारों की मदद से सूरज और तारों की स्थिति मापी जाती थी. ऐसा इसलिए ताकि लैटिट्यूड का पता लगाया जा सके.
पीढ़ियों से चली आ रही है कला
पुराने जमाने में नेविगेशन का मतलब सिर्फ औजारों का इस्तेमाल करना नहीं था बल्कि यह एक ऐसी कला थी जो सालों के अनुभव से निखरती थी. नाविक कहीं अलग-अलग तरीकों को मिलाकर इस्तेमाल करते थे. उनकी याददाश्त, आसपास की चीजों पर नजर रखने की कला और पीढ़ी दर पीढ़ी मिले व्यवहारिक ज्ञान की वजह से उन्हें सही रास्ते का पता चलता था.
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