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देश में इनकम पर पहली बार कब लगाया गया था टैक्स, किस वजह से हुई थी इसकी शुरुआत?

भारत में पहली बार टैक्स 1860 में लगाया गया था. सेना और पुलिस को इसमें विशेष छूट मिली थी. साल 1961 के आयकर अधिनियम ने आधुनिक टैक्स व्यवस्था का रूप ले लिया. आइए जानें कि यह टैक्स नियम क्यों आया था.

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  • जेम्स विल्सन ने 1860 में भारत में पहला आयकर शुरू किया.
  • 1857 विद्रोह से हुए ब्रिटिश वित्तीय घाटे की भरपाई.
  • शुरुआती आयकर में सैन्य कर्मियों को विशेष छूट मिली.

भारत में हर साल टैक्स चुकाने की प्रक्रिया एक सामान्य नियम की तरह देखी जाती है, लेकिन इसके पीछे का इतिहास बहुत दिलचस्प और हैरान करने वाला है. देश में टैक्स वसूलने की यह व्यवस्था आज की नहीं, बल्कि अंग्रेजों के जमाने की देन है. इसकी शुरुआत किसी सामान्य विकास कार्य के लिए नहीं की गई थी, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के ऊपर आए एक बहुत बड़े संकट को टालने और अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए की गई थी. इस पूरी कहानी के पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक और ऐतिहासिक मोड़ छिपा हुआ है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था का पूरा ढांचा ही हमेशा के लिए बदल कर रख दिया.

पहली बार टैक्स की घोषणा कब हुई?

भारत के इतिहास में पहली बार कमाई पर टैक्स लगाने की शुरुआत 24 जुलाई 1860 को की गई थी. इस व्यवस्था को लागू करने का पूरा श्रेय ब्रिटिश अर्थशास्त्री सर जेम्स विल्सन को जाता है, जिन्हें भारत का पहला वित्त मंत्री भी माना जाता है. विल्सन ने ही देश की जनता के सामने इस नए नियम को पेश किया था, जिसने आगे चलकर भारतीय कर प्रणाली का एक बेहद मजबूत आधार तैयार किया. इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को याद रखने के लिए ही हमारे देश में हर साल 24 जुलाई को 'आयकर दिवस' के रूप में बहुत ही प्रमुखता के साथ मनाया जाता है.

टैक्स लगाने की असली वजह क्या थी?

इस टैक्स को अचानक लागू करने के पीछे 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम था, जिसे भारतीय सैनिकों की बड़ी बगावत माना जाता है. इस आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया था. इस बगावत को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने अपनी सेना पर बेहिसाब पैसा बहाया, जिससे उनके खजाने को भारी नुकसान पहुंचा. सेना का खर्च 1856-57 में जहां 1 करोड़ 14 लाख पाउंड था, वह 1857-58 में बढ़कर सीधे 2 करोड़ 10 लाख पाउंड तक पहुंच गया. उस दौर में 1 पाउंड की कीमत पूरे 10 रुपये के बराबर हुआ करती थी.

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ब्रिटिश हुकूमत का नया कानून

इस आंदोलन के खत्म होने के बाद 1 नवंबर 1858 को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने एक बड़ी घोषणा की, जिसके तहत भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म कर ब्रिटिश सरकार का सीधा शासन लागू कर दिया गया. इसी दौरान 'द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858' पास हुआ, जिसने देश के सभी वित्तीय मामलों की पूरी कमान भारत के पहले सेक्रेटरी ऑफ स्टेट चार्ल्स वुड के हाथों में सौंप दी. 1857 की इस भीषण क्रांति के कारण साल 1859 तक आते-आते इंग्लैंड के ऊपर कर्ज का कुल बोझ बढ़कर 8 करोड़ 10 लाख पाउंड के बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका था.

जेम्स विल्सन का भारत आगमन

इस भयंकर आर्थिक तंगी से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1859 में जेम्स विल्सन को विशेष तौर पर भारत भेजा. विल्सन ब्रिटेन के मशहूर चार्टर्ड स्टैंडर्ड बैंक के संस्थापक और जाने-माने अर्थशास्त्री थे, जिन्हें वायसराय लॉर्ड कैनिंग की काउंसिल में फाइनेंस मेंबर यानी वित्त मंत्री की जिम्मेदारी दी गई. विल्सन ने जिम्मेदारी संभालते ही 18 फरवरी 1860 को देश का पहला बजट दुनिया के सामने रखा. इस पहले बजट में उन्होंने तीन बड़े टैक्स लगाने का प्रस्ताव दिया, जिनमें पहला इनकम टैक्स, दूसरा लाइसेंस टैक्स और तीसरा तंबाकू टैक्स शामिल था.

जेम्स विल्सन ने क्यों दिया मनुस्मृति का हवाला?

जेम्स विल्सन ने जब इन नए करों की घोषणा की, तो उन्हें पता था कि भारतीय जनता इसका कड़ा विरोध करेगी. इसलिए उन्होंने चालाकी से काम लेते हुए अपने भाषण में प्राचीन ग्रंथ 'मनुस्मृति' का उदाहरण दिया. विल्सन ने दलील दी कि उनका यह कदम कोई विदेशी या 'इंडियन' नहीं है, बल्कि पूरी तरह से 'भारतीय' परंपरा के अनुकूल ही है. हालांकि, उनकी इस दलील के बावजूद इस टैक्स कानून का पूरे देश में भारी विरोध हुआ. यहां तक कि उस समय के मद्रास प्रांत के गवर्नर सर चार्ल्स टेवेलियन ने भी इस कानून का खुलकर कड़ा विरोध किया था.

शुरुआती टैक्स के स्लैब क्या थे?

विल्सन का यह नया टैक्स कानून पूरी तरह से ब्रिटेन की तर्ज पर ही तैयार किया गया था. उस समय लागू किए गए नियमों के मुताबिक सालाना 200 रुपये से लेकर 500 रुपये तक कमाने वाले लोगों पर 2% के हिसाब से टैक्स लगाया गया था. वहीं जिन लोगों की सालाना आय 500 रुपये से अधिक थी, उन्हें अपनी कमाई का पूरे 4% हिस्सा टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा करना पड़ता था. हालांकि, देश के इस पहले बजट में सालाना 200 रुपये तक की बेहद कम कमाई करने वाले आम लोगों को टैक्स के दायरे से पूरी तरह बाहर रखते हुए राहत दी गई थी.

किन खास लोगों को मिली थी छूट?

इस पहले आयकर कानून की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि इसमें सेना, नौसेना और पुलिस के तमाम कर्मचारियों को टैक्स से पूरी तरह मुक्त रखा गया था. चूंकि उस जमाने में इन विभागों के ऊंचे पदों पर ज्यादातर अंग्रेज अधिकारी ही तैनात थे, इसलिए इस छूट का सीधा फायदा उन्हीं को मिला. उस समय सेना के एक कैप्टन का सालाना वेतन 4,980 रुपये और नौसेना के लेफ्टिनेंट का वेतन 2,100 रुपये हुआ करता था, जो टैक्स के दायरे में आने के बावजूद इस विशेष नियम के कारण एक भी रुपया टैक्स नहीं चुकाते थे.

नए विभाग का जन्म

साल 1922 में असहयोग आंदोलन के दौर में भारत के भीतर एक नया इनकम टैक्स कानून लाया गया, जिसके बाद से देश में आयकर विभाग के गठन की असली कहानी शुरू हुई. इस नए कानून के तहत पहली बार टैक्स अधिकारियों को अलग-अलग आधिकारिक पद दिए गए. इसके बाद साल 1946 में पहली बार एक प्रतियोगी परीक्षा के जरिए आयकर अधिकारियों की सीधे तौर पर भर्ती शुरू की गई, जिसे आगे चलकर साल 1953 में 'इंडियन रेवेन्यू सर्विस' यानी 'IRS' का नया नाम दिया गया, जो आज भी देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में से एक है.

प्रशासनिक कार्यों में बदलाव

शुरुआती दौर में आयकर विभाग का काम सिर्फ टैक्स वसूलना नहीं था, बल्कि साल 1963 तक इस विभाग के पास संपत्ति कर, सामान्य कर और प्रवर्तन निदेशालय जैसे कई बड़े प्रशासनिक काम भी हुआ करते थे. इन कामों को और बेहतर बनाने के लिए साल 1963 में राजस्व अधिनियम केंद्रीय बोर्ड कानून लाया गया, जिसके तहत 'केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड' यानी 'CBDT' का गठन किया गया. इसके बाद साल 1972 में टैक्स की बकाया राशि वसूलने के लिए एक बिल्कुल अलग विंग बनाई गई और कमिश्नर नियुक्त किए गए. वर्तमान में देश में 1961 का आयकर कानून लागू है, जिसमें समय के साथ बदलाव होते रहते हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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