Harpic vs Godrej Dispute: आपने हार्पिक की जानी-पहचानी नीली बोतल तो जरूर देखी होगी. यह बोतल थोड़ी झुकी हुई होती है, गर्दन टेढ़ी होती है और इस पर लाल ढक्कन लगा होता है. यह बोतल अब एक बड़ी कानूनी लड़ाई का हिस्सा बन चुकी है. दरअसल यह विवाद तब शुरू हुआ जब गोदरेज ने एक टॉयलेट क्लीनर लॉन्च किया. इसकी बोतल का आकार और बनावट हार्पिक की बोतल से मिलता जुलता है. इसके बाद डिजाइन के मालिकाना हक को लेकर एक कानूनी टकराव शुरू हो गया. यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या किसी बोतल के डिजाइन का सच में कॉपीराइट लिया जा सकता है या नहीं.

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डिजाइन सुरक्षा के बारे में कानून क्या कहता है? 

भारत में किसी प्रोडक्ट की बाहरी बनावट की सुरक्षा डिजाइन अधिनियम 2000 के तहत की जाती है. यह कानून किसी भी चीज के काम करने के तरीके के बजाय इसकी बाहरी बनावट, यानी कि उसके आकार, पैटर्न या फिर सजावट को सुरक्षित रखने पर जोर देता है. आसान शब्दों में कहें तो अगर किसी प्रोडक्ट का डिजाइन अनोखा है और वह देखने में आकर्षक लगता है तो उसे इस कानून के तहत रजिस्टर करवा कर सुरक्षित किया जा सकता है. 

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लेकिन इसके लिए कुछ कड़ी शर्ते हैं. डिजाइन बिल्कुल नया होना चाहिए और रजिस्ट्रेशन से पहले उसे आम लोगों के सामने जाहिर नहीं किया गया होना चाहिए. यह डिजाइन पहले से मौजूद किसी ट्रेडमार्क या कॉपीराइट से मेल नहीं खाना चाहिए. सबसे जरूरी बात यह है कि यह डिजाइन सिर्फ काम करने के मकसद से बनाया गया नहीं होना चाहिए. इस कानून के तहत सुरक्षा शुरू में 10 साल के लिए मिलती है. इसे 5 साल और बढ़ाया जा सकता है. इस तरह कुल मिलाकर 15 साल तक की सुरक्षा मिल सकती है.

क्या है हार्पिक का तर्क?

हार्पिक की मूल कंपनी का तर्क है कि इसकी बोतल का अनोखा आकर सिर्फ एक डिजाइन नहीं है, बल्कि यह उसकी ब्रांड पहचान का एक हिस्सा है. उनके मुताबिक बोतल की टेढ़ी गर्दन और उसके खास बनावट की वजह से ग्राहक लेबल देखे बिना भी तुरंत उस प्रोडक्ट को पहचान लेते हैं. हार्पिक का दावा है कि इसी वजह से इस डिजाइन पर सिर्फ उनका ही अधिकार है. 

क्या है गोदरेज का तर्क?

दूसरे तरफ गोदरेज ने इस दावे को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया है की  हार्पिक के डिजाइन को मिली सुरक्षा की समय सीमा पहले ही खत्म हो चुकी है. इससे भी जरूरी बात यह है कि गोदरेज का दावा है कि बोतल की टेढ़ी गर्दन का मकसद सिर्फ काम को आसान बनाना है. यानी इसकी मदद से टॉयलेट के किनारे के नीचे की सफाई आसानी से हो जाती है. यानी किसी एक कंपनी का इस पर एकाधिकार नहीं हो सकता.

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