Gyanesh Kumar Controversy: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर चुनावी गड़बड़ी, वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और चुनाव आयोग के अंदरूनी मतभेदों से जुड़े आरोपों को लेकर दबाव बढ़ रहा है. विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी विरोध कर रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी ज्ञानेश कुमार और दो दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है. 

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हालांकि यह पहली बार नहीं है जब कोई मुख्य चुनाव आयुक्त विवादों के केंद्र में. कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को राजनीतिक आलोचना, संस्थागत विवाद और अपने फैसलों पर सवालों का सामना करना पड़ा है. 

टी एन शेषन

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टी एन शेषन का कार्यकाल 1990 से 1996 तक चला. टी एन शेषन को भारत के सबसे मजबूत और बेबाक मुख्य चुनाव आयुक्तों में से एक के तौर पर याद किया जाता है. लेकिन उनके कार्यकाल में एक बड़ा संस्थागत विवाद भी हुआ था. 

यह विवाद तब शुरू हुआ जब केंद्र सरकार ने 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों, एम एस गिल और जी वी जी कृष्णमूर्ति को नियुक्त करने का फैसला किया. इस कदम को आयोग के अंदर शेषन की मजबूत और स्वतंत्र स्थिति को सीमित करने की कोशिश के तौर पर देखा गया. 

शेषन ने सरकार के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. चुनाव आयुक्तों के बीच का विवाद सार्वजनिक हो गया और आखिरकार कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट ने अंत में फैसला सुनाया कि चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के पास समान शक्तियां होंगी.

एन गोपाल स्वामी

एन गोपाल स्वामी का कार्यकाल 2006 से 2009 तक चला. उनके कार्यकाल के दौरान एक बड़ा विवाद सामने आया. जनवरी 2009 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले गोपाल स्वामी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को पत्र लिखकर साथी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की. गोपाल स्वामी ने चावला पर पक्षपाती होने का आरोप लगाया और यह तर्क दिया कि उन्हें आयोग से हटा दिया जाना चाहिए. 

सरकार और राष्ट्रपति दोनों ने इस सिफारिश को खारिज कर दिया. यह विवाद इस वजह से भी खास था क्योंकि बाद में चावला ने गोपाल स्वामी की जगह मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला.

आर वी एस पेरी शास्त्री 

पेरी शास्त्री का कार्यकाल 1986 से 1990 तक चला. उन्हें भी चुनाव के समय और उन्हें कराने के तरीकों से जुड़े फैसलों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा. उनके कार्यकाल के दौरान विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर सत्ताधारी पार्टी का पक्ष लेने का आरोप लगाया था. एक बड़ा विवाद 1987 में हरियाणा में कानून व्यवस्था के आधार पर चुनाव टालने को लेकर हुआ जबकि मेघालय में चुनाव होने दिए गए. 

विपक्षी दलों ने इस अलग-अलग रवैये पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि आयोग दोहरे मापदंड को अपना रहा है. यह विवाद एक ऐसे समय में हुआ जब राजीव गांधी सरकार ने चुनाव आयोग में अतिरिक्त सदस्य शामिल करने की पहली कोशिश की थी.

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आर के त्रिवेदी 

आर के त्रिवेदी का कार्यकाल 1982 से 1985 तक चला. उनके कार्यकाल के दौरान भी चुनाव आयोग के निष्पक्षता को लेकर विपक्षी दलों ने आलोचना की. यह विवाद मुख्य रूप से 1983 में असम में अस्थिर राजनीतिक और कानून व्यवस्था की स्थिति के बीच चुनाव कराने के फैसले से जुड़ा था.  विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाए और त्रिवेदी की नियुक्ति और कामकाज को लेकर चिंता जताई. इस आलोचना से उस बड़ी राजनीतिक बहस का पता चलता है कि क्या चुनाव आयोग को आजाद तौर पर काम कर रहा था या फिर मौजूदा सरकार के प्रभाव में था.

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