केंद्र सरकार ने मोटर व्हीकल नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए देश में हरित ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम उठाया है. इस नई व्यवस्था के तहत ऑटोमोबाइल सेक्टर में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए रास्ते पूरी तरह साफ हो गए हैं, जिससे वाहन निर्माता कंपनियां अब बाजार में पूरी तरह एथेनॉल आधारित मॉडल उतारने की तैयारी में जुट गई हैं. सरकार के इस कदम से देश की ऊर्जा जरूरतों को एक नई दिशा मिलेगी और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता तेजी से कम होगी, लेकिन क्या इससे विदेशी मुद्रा भी बचेगी. आइए जान लेते हैं.
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को आधिकारिक मंजूरी
केंद्र सरकार ने हाल ही में केंद्रीय मोटर व्हीकल नियमों में संशोधन की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. इसके तहत अब देश में 100 प्रतिशत एथेनॉल यानी ई-100 (E100) और ई-85 (E85) ईंधन पर चलने वाले वाहनों को कानूनी रूप से हरी झंडी मिल गई है. वाहन बाजार में पहले से ही कई कंपनियां अपने नए और आधुनिक फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल लाने की योजना पर काम कर रही थीं, जिन्हें अब सरकार के इस फैसले से बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा. इस बदलाव से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में एक नया दौर शुरू होने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है.
विदेशी मुद्रा भंडार को कितनी मिल रही मजबूती?
भारत सरकार द्वारा पिछले कुछ वर्षों से लगातार इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसके बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, साल 2014-15 से लेकर अब तक इस कार्यक्रम के जरिए देश के खजाने से बाहर जाने वाली लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई जा चुकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे ई-100 और उच्च-मिश्रण वाले ईंधन का दायरा बढ़ेगा, सालाना लगभग 43,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा की भारी बचत होना तय है.
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आयात पर निर्भरता कम करने का विकल्प
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से भी अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसके भुगतान में देश के विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है. इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए घरेलू स्तर पर उत्पादित होने वाला एथेनॉल एक बेहतरीन विकल्प साबित हो रहा है. देश में गन्ने, मक्के और टूटे हुए चावल जैसे कृषि उत्पादों से तैयार होने वाले इस जैव-ईंधन के उपयोग से विदेशी क्रूड ऑयल पर देश की निर्भरता लगातार घट रही है.
वाहन चालकों के लिए ईंधन की रन-कॉस्ट
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, पूरी तरह एथेनॉल यानी ई-100 पर चलने वाले वाहनों का संचालन खर्च पारंपरिक पेट्रोल के मुकाबले काफी किफायती बैठ सकता है. हालांकि शुद्ध एथेनॉल की कैलोरी वैल्यू पेट्रोल की तुलना में थोड़ी कम होती है, जिससे गाड़ी के माइलेज या रिफिलिंग की जरूरत पर हल्का असर पड़ सकता है, लेकिन इसकी प्रति लीटर खरीद लागत और वाहन चलाने का कुल खर्च काफी कम होने का अनुमान है. सरकार की इस पहल से जहां एक तरफ पर्यावरण प्रदूषण कम होगा, वहीं दूसरी तरफ किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी मदद मिलेगी.
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