नेपाल के रसुवा जिले में स्थित भोटेकोशी नदी में बीते बुधवार को आई प्रलयकारी बाढ़ ने एक बार फिर पूरी दुनिया को सचेत कर दिया है. इस अचानक आई त्रासदी ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली और नुवाकोट, धाडिंग, चितवन, तनहुं, गोरखा तथा नवलपरासी ईस्ट जैसे निचले जिलों तक तबाही का मंजर फैला दिया. हजारों लोग बेघर हो गए और बुनियादी ढांचा पूरी तरह तबाह हो गया. वैज्ञानिक इस बात की गहराई से जांच कर रहे हैं कि आखिर यह जलप्रलय इतनी तेजी से कैसे आया. इस पूरी घटना के केंद्र में एक ही बड़ा सवाल खड़ा है कि क्या इंसानी गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन ने हिमालय को पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील और खतरनाक बना दिया है?

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बेहद संवेदनशील है यह हिमालयन क्षेत्र

हिमालय का यह पूरा क्षेत्र पहले से ही संवेदनशील भौगोलिक संरचना के लिए जाना जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस घाटी में विनाशकारी आपदाओं का एक लंबा इतिहास रहा है. ठीक एक साल पहले 2025 में इसी घाटी में एक हिमनद झील के फटने से भीषण बाढ़ आई थी. इससे पूर्व 2024 में क्षेत्र के दूसरे हिस्से में बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिमस्खलन दर्ज किया गया था. वर्ष 2015 के विनाशकारी भूकंप के दौरान भी लांगटांग क्षेत्र में भारी भूस्खलन हुए थे, जिससे साफ है कि यह इलाका भूगर्भीय रूप से अत्यंत कमजोर हो चुका है.

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ग्लोबल वार्मिंग की मार और तेजी से पिघलते हिमनद

हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में तापमान वैश्विक औसत की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ रहा है. ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर पृथ्वी पर सबसे ज्यादा बर्फ और हिमनद इसी हिमालयी शृंखला में मौजूद हैं. यहां के लगभग 63,000 से अधिक ग्लेशियर एशिया की 10 प्रमुख नदी प्रणालियों को पानी देते हैं, जिन पर अरबों लोगों की आजीविका निर्भर है. हालांकि, समुद्र तल से 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 78% ग्लेशियर क्षेत्र बढ़ते तापमान की सीधी चपेट में हैं. वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि ऐसी घटनाएं अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं.

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पिघलती बर्फ का भयावह आंकड़ा और भविष्य की चेतावनी

संयुक्त राष्ट्र और जलवायु एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से 2019 के बीच दुनिया भर के ग्लेशियरों ने प्रतिवर्ष 267 गीगाटन बर्फ खोई है, जो गीजा के 46,500 महान पिरामिडों के कुल वजन के बराबर है. यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोक भी लिया जाए, तब भी शताब्दी के अंत तक दुनिया के आधे ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे. वर्तमान में जारी वैश्विक नीतियां पृथ्वी के तापमान को औद्योगिक काल से 2.8 डिग्री सेल्सियस ऊपर ले जाने की दिशा में बढ़ रही हैं, जिससे वर्ष 2000 के बाद से हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो चुकी है.

कमजोर पड़ते पहाड़ और परमाफ्रॉस्ट का पिघलना

जैसे-जैसे ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं, सदियों से बर्फ के सहारे टिकी रहने वाली चट्टानें अब खुले वातावरण, बारिश और सीधे तापमान के संपर्क में आ रही हैं. इससे पहाड़ों की प्राकृतिक पकड़ ढीली हो रही है. इसके अलावा परमाफ्रॉस्ट यानी वर्षों से जमी हुई बर्फीली जमीन के पिघलने से ढलानों की मजबूती खत्म हो रही है. इस स्थिति में एक छोटा सा हिमस्खलन या भूस्खलन भी एक के बाद एक कई आपदाओं को जन्म देता है- जैसे पहले लैंडस्लाइड, फिर नदी का रुकना और अंत में महाविनाशकारी बाढ़.

आधे घंटे में 30 फीट उछला जलस्तर

वैज्ञानिकों की मानें तो नेपाल की इस आपदा का सबसे खौफनाक पहलू इसकी अनपेक्षित गति थी. ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटने के कारण महज 30 मिनट के भीतर नदियों का जलस्तर 9 मीटर तक ऊपर उठ गया. इतनी अचानक आई जल-वृद्धि ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को भागने या संभलने का एक मौका तक नहीं दिया. प्रत्यक्षदर्शियों और शोधकर्ताओं ने बताया कि पानी की यह प्रचंड लहर इतनी तेज थी कि जो भी इसके रास्ते में आया, वह ताश के पत्तों की तरह ढह गया.

चट्टान और बर्फ के मलबे से बना प्राकृतिक बांध और सैलाब

शुरुआती वैज्ञानिक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि भोटेकोशी की सहायक नदी ल्हेंदे खोला में भारी मात्रा में बर्फ, मलबे और चट्टानों का विशाल ढेर खिसककर गिरा था. पहाड़ से टूटे इस मलबे ने नदी के स्वाभाविक बहाव को रोक दिया, जिससे अस्थायी रूप से एक कृत्रिम झील या बांध बन गया. जब पानी का दबाव चरम सीमा पर पहुंचा, तो यह रुकावट एक झटके में टूट गई. अत्यधिक वेग से नीचे भागे इस कीचड़, पत्थरों और पानी के मिश्रित सैलाब ने आगे चलकर एक भयानक प्रलय का रूप धारण कर लिया.

विकास की अंधी दौड़ में बढ़ती ग्लोबल वॉर्मिंग

नेपाल की कुल पनबिजली उत्पादन का लगभग 10% हिस्सा इसी आपदा प्रभावित घाटी में स्थित था, जिसे भारी नुकसान पहुंचा है. हर साल लाखों पर्यटक हिमालय की ओर रुख करते हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे के निर्माण के बीच पूर्व चेतावनी प्रणालियों की भारी कमी बनी हुई है. इतने विशाल और दुर्गम इलाके की लगातार सैटेलाइट निगरानी करना बेहद कठिन है. वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि ऐसी बहुस्तरीय आपदाओं में लोगों के पास सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए घंटों नहीं, बल्कि केवल कुछ मिनट का समय होता है. कई इलाके अब इंसानी बसावट के लिए पूरी तरह असुरक्षित हो चुके हैं. 

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