Foreign Companies in India: स्टारलिंक को अभी तक भारत में अपनी सेवा शुरू करने की मंजूरी नहीं दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने उन नियमों का पालन करने से इनकार कर दिया है जिनके तहत सैटलाइट इंटरनेट प्रदाताओं को देश के अंदर अपना खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करना जरूरी है.
भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली विदेशी कंपनियों को कंपनी अधिनियम 2013 और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 का पालन करना होता है. उनके लिए सही रास्ते इस बात पर निर्भर होते हैं कि उनका कारोबार किस तरह का है, उस क्षेत्र में कितना निवेश करने की अनुमति है और क्या वे पूरी तरह से व्यावसायिक रूप से काम करना चाहती हैं या सिर्फ सीमित उपस्थिति बनाए रखना चाहती हैं.
भारत में प्रवेश का तरीका चुनना
एक विकल्प पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी बनाना है. जिन क्षेत्रों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है वहां कोई विदेशी कंपनी भारत में अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली प्राइवेट लिमिटेड कंपनी स्थापित कर सकती है. यह सहायक कंपनी एक स्वतंत्र कानूनी इकाई के रूप में काम करती है और लागू कानून के दायरे में रहते हुए एक भारतीय कंपनी की तरह ही पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना कामकाज चला सकती है. एक और विकल्प संयुक्त उद्यम है. इस व्यवस्था के तहत कोई विदेशी कंपनी कारोबार करने के लिए किसी भारतीय साझेदारी या फिर कंपनी के साथ रणनीतिक साझेदारी करती है.
विशिष्ट कार्यों के लिए कार्यालय
कोई विदेशी कंपनी विनिर्माण, अनुसंधान, आयात निर्यात या फिर तकनीकी सेवाओं जैसी गतिविधियों के लिए एक शाखा कार्यालय स्थापित कर सकती है. हालांकि शाखा कार्यालय को भारत में सीधे खुदरा व्यापार करने की अनुमति नहीं है और इसे स्थापित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की मंजूरी लेनी पड़ती है.
संपर्क कार्यालय की भूमिका काफी ज्यादा सीमित होती है. वह अपनी मूल कंपनी को भारतीय बाजार को समझने, कारोबार के नए अवसरों को ढूंढने और कंपनी का प्रचार प्रसार करने में मदद कर सकता है. यह भारत में कोई व्यावसायिक इनकम अर्जित नहीं कर सकता और ना ही कोई व्यावसायिक गतिविधि कर सकता है.
कॉर्पोरेट गवर्नेंस और पंजीकरण
विदेशी कंपनियों को कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े नियमों को भी पूरा करना होता है. नियमों के मुताबिक कंपनी के बोर्ड में कम से कम दो निदेशक होने चाहिए. इनमें से एक भारत का निवासी होना चाहिए. यहां निवासी का मतलब ऐसे व्यक्ति से है जिसने पिछले कैलेंडर वर्ष के दौरान कम से कम 182 दिन भारत में बिताए हों.
विदेशी निवेश के लिए दो रास्ते होते हैं. पहला है ऑटोमेटिक रूट और दूसरा है सरकारी रूट. ऑटोमेटिक रूट के तहत सरकार या फिर भारतीय रिजर्व बैंक से पहले से मजदूरी लेने की जरूरत नहीं होती है. सरकारी रूट के तहत संबंधित मंत्रालय से पहले से अनुमति लेनी पड़ती है. इसी के साथ यह आमतौर पर संवेदनशील क्षेत्रों में किए जाने वाले निवेश पर लागू होता है.
कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के पास पंजीकरण कराना भी एक जरूरी शर्त है. कारोबार शुरू करने के 30 दिनों के अंदर कंपनी को अपना चार्टर और दूसरे जरूरी दस्तावेज जमा करके रजिस्टार ऑफ कंपनी के पास पंजीकरण करना होता है.
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टैक्स, फाइलिंग और स्थानीय कानून
विदेशी कंपनियों को भारत में होने वाली कमाई पर कॉर्पोरेट टैक्स देना पड़ता है. हालांकि इनका टैक्स ढांचा घरेलू कंपनियों से थोड़ा अलग हो सकता है. इसी के साथ उन्हें रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास फॉर्म AOC-4 और MGT-7 के जरिए अपनी सालाना ऑडिट की गई बैलेंस शीट और वित्तीय विवरण जमा करने होते हैं.
विदेशी निवेश के मामले में कुछ अतिरिक्त रिपोर्टिंग की जरूरतें भी होती हैं. शेयर आवंटित होने के 30 दिनों के अंदर फॉर्म FC-GPR फाइल करना होता है और विदेशी देनदारी और संपत्ति का सालाना रिटर्न 15 जुलाई तक जमा करना जरूरी है.
भारत में काम करने का मतलब सिर्फ कंपनी का पंजीकरण कराना ही नहीं बल्कि यहां के स्थानीय कानून का पालन करना भी है. विदेशी व्यवस्थाओं पर भारतीय मजदूर कानून लागू होते हैं. इनमें न्यूनतम वेतन और प्रोविडेंट फंड एक्ट से जुड़े नियम शामिल हैं.
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