Japan Earthquake: जापान के उत्तर पूर्वी हिस्से में रविवार तड़के एक बार फिर से 6.1 तीव्रता का भूकंप आया है. इससे वहां और उसके आसपास के प्रांत में रहने वाले लाखों लोग खौफ में हैं. पिछले कुछ दिनों में लगातार 2-3 बार आई इस कुदरती आपदा ने पूरी दुनिया को डराकर रख दिया है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि वहां पर अगर भयानक भूकंप आ जाए तो भी जापान की गगनचुंबी इमारतें खड़ी रहती हैं. चलिए जानें कि वहां पर किस बेजोड़ तकनीक से बिल्डिंग्स का निर्माण होता है.

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पैसिफिक रिंग ऑफ फायर पर बसा देश

भौगोलिक बनावट की वजह से जापान दुनिया के सबसे खतरनाक हिस्से पैसिफिक रिंग ऑफ फायर पर बसा हुआ देश है. यह एक ऐसा अशांत क्षेत्र है, जहां पर टेक्टॉनिक प्लेट्स आपस में टकराती रहती हैं और हर साल यहां पर छोटे-बड़े भूकंप आते रहते हैं. टोक्यो, ओसाका, योकोहामा जैसे बड़े शहरों में आसमान को छूती हुई इमारतें इस संकट से बचने के लिए लचीली बनाई जाती हैं. जापान की ये विशाल इमारतें रिक्टर स्केल पर 7 या उससे भी ज्यादा तीव्रता के विनाशकारी झटकों को आसानी से झेलने के लिए डिजाइन की जाती हैं.

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जान बचाने के लिए दो तरफा सुरक्षा कवच

जापान में किसी भी इमारत को बनाने के लिए पहले इंजीनियर दो बहुत कड़े स्तरों पर प्लानिंग करते हैं. पहले नियम के तहत, इमारत को इस तरीके से डिजाइन किया जाता है कि वह अपने पूरे जीवनकाल में आने वाले 3-4 सामान्य भूकंप को तो आसानी से झेल ले. वहीं दूसरा और सबसे जरूरी नियम कि विनाशकारी भूकंप जैसे 1923 में ग्रेट कांटो में देखने को मिला था, इसको ध्यान में रखकर निर्माण किया जाता है. इसके तहत अगर भूकंप बेहद खतरनाक हो तो भले ही इमारत के ढांचे को थोड़ा-बहुत नुकसान होगा, लेकिन वह ताश के पत्ते की तरह गिरेगी नहीं. 

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बिल्डिंग्स कैसे सोख लेती हैं विनाशकारी ऊर्जा?

जब भी भूकंप की तेज लहरें जमीन से टकराती हैं तो वे अपने साथ भारी मात्रा में विनाशकारी ऊर्जा लेकर आती हैं. किसी भी इमारत के बचे रहने का राज यही है कि वह इस ऊर्जा को अपने अंदर सोख ले. जापान के नामी स्ट्रक्चरल इंजीनियरों के अनुसार, जब इमारत जमीन के साथ सीधे जुड़ने की बजाय इस सिस्मिक एनर्जी को खत्म कर देती है, तो वह गिरने से बच जाती है. इसके लिए जापानी वैज्ञानिक सिस्मिक आइसोलेशन नामक एक आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हैं. इस तकनीक में पूरी बिल्डिंग को जमीन की मुख्य सतह से थोड़ा अलग यानि हवा में बेस के सहारे उठा दिया जाता है, जिससे कि कंपन सीधे ऊपर नहीं पहुंच पाता है.

शॉक एब्जॉर्बर और रबर पैड

बिल्डिंग को जमीन से अलग रखने के लिए उसकी सबसे निचली नींव में बेहद मजबूत और लचीले रबर पैड लगाए जाते हैं. इनकी मोटाई 30 से 50 सेंटीमीटर तक होती है. इसके साथ-साथ वहां पर खास तरीके से शॉक एब्जॉर्बर भी लगाए जाते हैं. जब भी भूकंप की वजह से धरती तेजी से डोलती है तो रबर पैड स्प्रिंग की तरीके से काम करते हैं और शॉक वेव्स को ऊपर तक जाने नहीं देते हैं. इस तकनीक से घर के अंदर बैठे लोगों को सिर्फ हल्के कंपन का एहसास होता है.

बिल्डिंग के अंदर लगे मोशन डैंपर्स

जापान के इंजीनियर सिर्फ जमीन की नींव को ही मजबूत नहीं करते हैं, बल्कि वे इमारत के ऊपरी फ्लोर तक भी सुरक्षा का इंतजाम करते हैं. इन ऊंची-ऊंची बिल्डिंग्स के बीच में खास मोशन डैंपर्स का इस्तेमाल किया जाता है, जो कि दिखने में किसी साइकिल के पंप की तरह होते हैं, इनके अंदर गाढ़ा तरल पदार्थ या तेल भरा होता है. जब भूकंप की वजह से इमारत एक ओर झुकने लगती है तो ये डैंपर्स विपरीत दिशा में दबाव बनाकर उसके वाइब्रेशन को तुरंत रोक देते हैं. टोक्यो की मशहूर 53 मंजिला रोपोंगी हिल्स मोरी टावर जैसी बड़ी-बड़ी बिल्डिंग भी इसी तकनीक पर आधारित हैं.

इंजीनियरिंग का गणित

तकनीकी उपकरणों के अलावा किसी बिल्डिंग को सुरक्षित रखने में उसके लेआउट और आर्किटेक्चरल डिजाइन की बड़ी भूमिका होती है. जापान के निर्माण विशेषज्ञों की मानें तो भूकंपरोधी इमारतों को जितना हो सके नियमित, सीधा और चौकोर आकार में बनाना चाहिए. इसका मतलब कि इमारत के हर फ्लोर पर ऊंचाई बिल्कुल बराबर होनी चाहिए और सभी पिलर्स एक समान ग्रिड लाइन पर होने चाहिए. इस तकनीक की वजह से भूकंप का दबाव पूरी बिल्डिंग पर एक समान बंट जाता है और किसी एक कोने के टूटने का खतरा नहीं होता है.

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