AI Water Consumption: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दुनिया को काफी तेजी से बदल रहा है. यह चैटबॉट और इमेज जनरेटर से लेकर एडवांस्ड रिसर्च टूल और बिजनेस ऑपरेशन तक हर चीज को चला रहा है. हालांकि इस डिजिटल क्रांति के पीछे पर्यावरण से जुड़ी एक बढ़ती हुई चिंता है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता. वह है पानी की खपत. हाल की स्टडीज और रिपोर्ट से पता चलता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर के तेजी से विस्तार से मीठे पानी के संसाधनों की मांग काफी बढ़ रही है. इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह टेक्नोलॉजी आने वाले सालों में दुनिया भर में पानी के संकट को और बढ़ा सकती है.
क्या कहती है रिपोर्ट?
जून 2026 में यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संचालित डेटा सेंटरों में पानी की खपत काफी ज्यादा बढ़ सकती है. रिसर्च करने वालों का यह अनुमान है कि इन सुविधाओं को चलाने के लिए जरूरी पानी की मात्रा लगभग 1.3 अरब लोगों की सालाना घरेलू पानी की जरूरत के बराबर हो सकती है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इतने पानी की जरूरत क्यों?
हालांकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूरी तरह से डिजिटल टेक्नोलॉजी लगती है, लेकिन इसे चलाने वाले सिस्टम काफी बड़े फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करते हैं. बड़े आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल डेटा सेंटरों के अंदर मौजूद कंप्यूटर सर्वर के बड़े नेटवर्क के जरिए काम करते हैं. डेटा को प्रोसेस करते समय और लाखों यूजर रिक्वेस्ट का जवाब देते समय ये सर्वर काफी ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं. ज्यादा गर्मी से बचने के लिए डैटा सेंटर एडवांस्ड कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. इनमें से कई बड़ी मात्रा में मीठे पानी पर निर्भर करते हैं. जैसे-जैसे दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ रहा है इन सुविधाओं की संख्या और आकार भी तेजी से बढ़ रही है.
कूलिंग की जरूरत
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वॉटर फुटप्रिंट में सबसे बड़ा योगदान डेटा सेंटरों में इस्तेमाल होने वाली कूलिंग प्रोसेस का है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम को ट्रेन करने और चलने के लिए पावरफुल कंप्यूटर चिप्स और ग्राफिक्स प्रोसेसर 24 घंटे काम करते हैं. अगर तापमान को सावधानी से कंट्रोल न किया जाए तो इन इक्विपमेंट से निकलने वाली गर्मी हार्डवेयर को नुकसान पहुंचा सकती है. इस चुनौती से निपटने के लिए कई सुविधाएं लिक्विड कूलिंग टेक्नोलॉजी और कूलिंग टावरों का इस्तेमाल करती हैं.
पानी की कमी वाले इलाकों में बढती चिंताएं
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार ने दुनिया के कई हिस्सों में चिंताएं पैदा कर दी हैं. चिली जैसे सूखे से प्रभावित इलाकों में लोगों ने ताजे पानी के काफी ज्यादा इस्तेमाल की चिंताओं की वजह से बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट का विरोध किया है.
क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से दुनिया में पानी का संकट पैदा होगा?
अकेले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से धरती के जल स्रोत खत्म होने की संभावना कम है. हालांकि जानकारों का यह कहना है कि अगर बिना टिकाऊ योजना के इसका विकास जारी रहा तो यह पानी की मौजूदा कमी को और बढ़ा सकता है. पर्यावरण शोधकर्ताओं के मुताबिक 2030 तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सालाना वॉटर फुटप्रिंट 1.1 से 1.7 ट्रिलियन गैलन तक पहुंच सकता है.
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