Dussehra 2025: हिंदू परंपरा में अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरे का त्योहार मनाया जाता है. यह सिर्फ एक उत्सव नहीं है बल्कि धर्म, सत्य और साहस की जीत का प्रतीक भी है. इस त्यौहार पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है जिसका मतलब है अच्छाई की बुराई पर विजय. लेकिन पश्चिमी दिल्ली के टैगोर गार्डन और सुभाष नगर के बीच स्थित ततारपुर इलाके में हर साल दशहरे की तैयारी में कुछ अजीब समस्याएं आती हैं. आइए जानते हैं क्या हैं ये समस्याएं.

रावण के पुतले की चोरी 

दिल्ली के इस इलाके में रावण के पुतलों का सबसे बड़ा बाजार लगता है. यहां कारीगर रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं. पूरी तैयारी के बावजूद भी न जाने कैसे यहां पर रावण के पुतलों की चोरी हो जाती है. यहां पर चोरी एक आम समस्या बन चुकी है. हैरानी की बात यह है कि जहां पहले रावण से लोग डरा करते थे वहीं आज चोरों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वे रावण के पुतले को ही चुराने लगे.

कैसे होती हैं ये चोरियां?

दरअसल यह चोरियां अक्सर रात में या फिर सुबह-सुबह होती हैं. यह वह वक्त होता है जब कारीगर और दुकानदार सो रहे होते हैं. कुछ मामलों में तो पुतले के सिर्फ कुछ हिस्से ही चोरी होते हैं जैसे कि चेहरा या फिर निचला हिस्सा. इसे साफ जाहिर होता है कि कर अंधेरे और गहरी नींद का फायदा उठाते हैं. इस चोरी से बचने के लिए कारीगर अपने पुतलों की सुरक्षा के लिए पूरी रात जगते हैं. पुतलों की चोरी करने को मुश्किल बनाने के लिए वे अक्सर पुतलों को तार से बांध देते हैं. लेकिन इसके बावजूद भी हर साल कुछ पुतले चोरी हो ही जाते हैं. 

कारीगरों और त्योहार पर असर

यह चोरियां कारीगरों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं. कारीगर हफ्तों तक इन पुत्रों को बनाने में मेहनत करते हैं. चोरी हुए पुतलों से आर्थिक नुकसान तो होता ही है साथ ही दशहरा मनाने में भी खलल पड़ता है. ततारपुर और आसपास के इलाकों के निवासियों के लिए यह चोरियां अब एक रिवाज ही बन गई हैं. 

कारीगर और स्थानीय लोग इन चोरियों से बचने के लिए काफी प्रयास करते हैं लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होता. त्योहार के नजदीक आने के साथ पुतलों को सुरक्षित रूप से जलाने की जगह तक पहुंचाने के लिए काफी ज्यादा निगरानी और चौकसी करनी पड़ती है.

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