अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा खत्म होते ही पूरी दुनिया की नजरें एक बार फिर एशिया के सबसे बड़े भू-राजनीतिक विवाद पर टिक गई हैं. वॉशिंगटन लौटने से पहले ट्रंप की इस यात्रा ने बीजिंग और अमेरिका के रिश्तों की नई दिशा तय की है, लेकिन इसी बीच इतिहास का वह पन्ना पलटना जरूरी हो जाता है, जो आज भी चीन और ताइवान के बीच सुलगती आग की असली वजह है. कभी चीन की मुख्य भूमि का हिस्सा रहा ताइवान आखिर कैसे एक अलग द्वीप बन गया और इस महाविवाद की असली जड़ क्या है, इसे गहराई से समझना जरूरी है.

Continues below advertisement

क्विंग राजवंश का पतन और राष्ट्रवाद का उदय

इस पूरे विवाद की कहानी साल 1895 से शुरू होती है, जब चीन के क्विंग राजवंश को जापान के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी. इस हार ने चीनी जनता के भीतर राजाओं के खिलाफ गुस्से की चिंगारी भड़का दी. यह गुस्सा साल 1911 में एक भीषण क्रांति में बदल गया, जिसे इतिहास में 'शिन्हाई रिवॉल्यूशन' के नाम से जाना जाता है. इस ऐतिहासिक क्रांति ने सदियों पुराने क्विंग राजवंश को सत्ता से हमेशा के लिए उखाड़ फेंका. इसके बाद 1 जनवरी 1912 को एक नए राष्ट्र 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' का उदय हुआ और सुन यात-सेन इसके पहले राष्ट्रपति बने.

Continues below advertisement

कुओमिंतांग और कम्युनिस्ट पार्टी का गठन

देश की कमान संभालने के बाद सुन यात-सेन ने साल 1919 में 'कुओमिंतांग' नाम की एक दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी पार्टी का गठन किया. उनका सबसे बड़ा मकसद जापान से मिली हार के बाद बिखरे हुए चीन को फिर से एक सूत्र में पिरोना था. इसी दौर में चीन के भीतर एक और राजनीतिक विचारधारा पैर पसार रही थी और साल 1921 में 'चीनी कम्युनिस्ट पार्टी' यानी सीसीपी का गठन हुआ. शुरुआत में चीन को एकजुट करने के साझा मकसद के कारण साल 1923 में सुन यात-सेन की राष्ट्रवादी सरकार और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच एक बड़ा समझौता हुआ.

यह भी पढ़ें: Sweden Import Garbage: दूसरे देशों से कचरा क्यों इंपोर्ट करता है स्वीडन, इसका करता क्या है? आज यहीं PM Modi का दौरा

मॉस्को में मिली खास मिलिट्री ट्रेनिंग

इस समझौते के तहत सुन यात-सेन ने साल 1923 में अपने सबसे भरोसेमंद लेफ्टिनेंट चिआंग काई-शेक को सैन्य और राजनीतिक शिक्षा हासिल करने के लिए मॉस्को भेजा. मॉस्को में चिआंग काई-शेक ने आधुनिक युद्ध और राजनीति की खास ट्रेनिंग ली. जब वे चीन वापस लौटे, तो उन्होंने कुओमिंतांग पार्टी के कार्यकर्ताओं को सैन्य ट्रेनिंग देना शुरू किया और देखते ही देखते पार्टी की अपनी एक मजबूत फौज खड़ी कर दी. यह वह दौर था जब चीन को एक करने के लिए राष्ट्रवादी और वामपंथी दोनों कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे.

सुन यात-सेन की मौत और पार्टी में बिखराव

यह एकता ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकी और साल 1925 में सुन यात-सेन की अचानक हुई मौत ने सब कुछ बदल दिया. उनकी मृत्यु के बाद कुओमिंतांग पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद गहरे हो गए और पार्टी दो धड़ों में बंट गई. साल 1927 आते-आते यह बिखराव पूरी तरह खुलकर सामने आ गया. अब तक राष्ट्रवादी सरकार गुआंगझोऊ प्रांत से काम कर रही थी, लेकिन मजबूत होती कम्युनिस्ट पार्टी चाहती थी कि सरकार वुहान से चलाई जाए, क्योंकि वहां उनका दबदबा ज्यादा था. चिआंग काई-शेक ने वामपंथियों की इस मांग को साफ तौर पर ठुकरा दिया.

शंघाई नरसंहार जिसने बदल दी राजनीति

इस खींचतान के बीच अप्रैल 1927 में कुओमिंतांग ने एक सख्त प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया कि कम्युनिस्ट पार्टी देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है. इसके तुरंत बाद शंघाई शहर में कुओमिंतांग की सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सैकड़ों वामपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया या सरेआम फांसी दे दी. वामपंथियों ने इस खूनी घटना को 'शंघाई नरसंहार' का नाम दिया, जिसने दोनों गुटों के बीच कभी न खत्म होने वाली नफरत की दीवार खड़ी कर दी.

रेड आर्मी का गठन और चीन में तीन राजधानियां

इस नरसंहार के जवाब में अगस्त 1927 में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी राष्ट्रवादी सरकार के खिलाफ एक हिंसक सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंक दिया. इसी बगावत के बीच वामपंथियों की अपनी कुख्यात फौज 'रेड आर्मी' का जन्म हुआ. इसके बाद चीन में राष्ट्रवादियों और वामपंथियों के बीच करीब 10 साल लंबा गृहयुद्ध चला. इस भयानक दौर में चीन के भीतर तीन अलग-अलग राजधानियां काम कर रही थीं. पहली बीजिंग थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त थी. दूसरी वुहान थी, जहां कम्युनिस्टों का कब्जा था और तीसरी नानजिंग थी, जहां से कुओमिंतांग की सरकार चल रही थी.

जापानी आक्रमण और चिआंग काई-शेक का अपहरण

जब चीन के लोग आपस में ही लड़ रहे थे, ठीक उसी समय फायदा उठाकर जापानी सेना ने चीन के मंचूरिया इलाके पर हमला करके उस पर कब्जा कर लिया. इसके बावजूद राष्ट्रवादी नेता चिआंग काई-शेक का पूरा ध्यान सिर्फ कम्युनिस्टों को कुचलने पर लगा रहा. उनकी इस जिद को रोकने के लिए 12 दिसंबर 1936 को चिआंग काई-शेक का अपहरण कर लिया गया और उनसे जबरन कम्युनिस्टों के साथ हाथ मिलाने का समझौता कराया गया. इतिहास में इसे शिआन घटना कहा जाता है, और इसी दौर में माओ त्से तुंग कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे.

ऐसे हुआ ताइवान का जन्म

साल 1945 में जब दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ तो जापान हार गया, लेकिन चीन के भीतर कुओमिंतांग और कम्युनिस्टों का गृहयुद्ध दोबारा शुरू हो गया. अब लड़ाई सीधे चीन की मुख्य भूमि पर राज करने की थी. चिआंग काई-शेक की सेना ने कम्युनिस्टों के गढ़ पर हमले किए, लेकिन माओ त्से तुंग की युद्ध रणनीति के आगे वे टिक नहीं पाए. कम्युनिस्ट सेना ने राष्ट्रवादियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. आखिरकार 1 अक्टूबर 1949 को माओ त्से तुंग ने बीजिंग में 'पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना' के गठन का ऐलान कर दिया. जान बचाने के लिए चिआंग काई-शेक अपने 20 लाख समर्थकों के साथ भागकर ताइवान द्वीप पहुंच गए और वहां 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' नाम से नई सरकार बना ली.

कूटनीतिक जंग और आज का सच

शुरुआती 20 सालों तक दोनों देशों के बीच बातचीत, व्यापार या किसी भी तरह के राजनयिक रिश्ते पूरी तरह ठप रहे. अमेरिका समेत संयुक्त राष्ट्र ने लंबे समय तक ताइवान की सरकार को ही असली चीन माना, लेकिन 1970 के दशक में पासा पलट गया और दुनिया ने बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार को असली मान्यता दे दी. आज ताइवान चीन के तट से करीब 160 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटा सा द्वीप है, जिसके पास अपनी चुनी हुई सरकार और संविधान है. ताइवान खुद को आजाद मानता है, लेकिन दुनिया के सिर्फ 14 देशों ने ही उसे मान्यता दी है, क्योंकि चीन आज भी उसे अपना एक बागी प्रांत मानता है.

यह भी पढ़ें: भारत से नीदरलैंड कैसे पहुंच गए थे चोल साम्राज्य के ऐतिहासिक दस्तावेज, जो अब लाए जाएंगे वापस?