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चीन-अमेरिका की दोस्ती हो गई तो भारत को कितना नुकसान? जान लें सारे समीकरण

चीन और अमेरिका की यह संभावित दोस्ती ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. यह भारत के रणनीतिक महत्व, आर्थिक नीति और एलएसी सीमा सुरक्षा के लिए बड़े जोखिम खड़े कर सकती है.

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  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के महत्व और क्वाड पर असर.

ग्लोबल पॉलिटिक्स की बिसात पर मोहरे बहुत तेजी से बदल रहे हैं. पिछले नौ सालों में पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का बीजिंग की धरती पर कदम रखना सिर्फ एक कूटनीतिक दौरा नहीं, बल्कि नए वैश्विक समीकरणों की शुरुआत है. ऐसे समय में जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में थोड़ी सुस्ती देखी जा रही है, डोनाल्ड ट्रंप का चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपना महान मित्र बताना नई दिल्ली के लिए बड़े नीतिगत सवाल खड़े करता है. दुनिया की इन दो सबसे बड़ी ताकतों का करीब आना भारत के व्यापार, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय दबदबे को सीधे प्रभावित कर सकता है. आइए इस पूरे समीकरण को गहराई से समझते हैं. 

ट्रंप का चौंकाने वाला बीजिंग दौरा

वैश्विक राजनीति में दोस्त और दुश्मन स्थायी नहीं होते, और यह बात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया चीन दौरे से एक बार फिर साबित हो गई है. पिछले नौ वर्षों में अमेरिका के पहले राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप बीजिंग की धरती पर पहुंचे. यह दौरा ऐसे नाजुक मोड़ पर हुआ है जब अमेरिका और भारत के संबंधों में वैसी गर्मजोशी और करीबी नहीं दिख रही है जैसी कुछ समय पहले हुआ करती थी. इसके साथ ही, अमेरिका इस समय ईरान के साथ चल रही भारी जंग और तनाव में पूरी तरह फंसा हुआ है, जिससे उसकी अपनी अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताएं बदल रही हैं.

तनाव के बाद अचानक दोस्ती

अमेरिका और चीन के बीच यह ऐतिहासिक मुलाकात कोई सामान्य घटना नहीं है. यह अहम दौरा कई महीनों तक दोनों देशों के बीच चले भारी टैरिफ विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और दोनों तरफ से हुई तीखी बयानबाजी के लंबे दौर के बाद मुमकिन हुआ है. इतने बड़े मनमुटाव के बावजूद, जब ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की, तो उन्होंने जिनपिंग को एक महान नेता और अपना करीबी मित्र कहकर संबोधित किया. ट्रंप की इस अप्रत्याशित गर्मजोशी ने पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों को हैरान कर दिया है और एक बिल्कुल नया संदेश दिया है. 

हालांकि, चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती इस नई गर्मजोशी को सीधे तौर पर भारत के खिलाफ एक साजिश के रूप में नहीं देखा जा सकता, लेकिन एशिया और पूरी दुनिया की राजनीति पर इसके पड़ने वाले गहरे असर को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है. 

यह भी पढ़ें: Global Fuel Crisis: चीन और अमेरिका को क्यों नहीं है ऊर्जा संकट की चिंता, भारत को ही क्यों करनी पड़ रही बचत?

भारत की संतुलनकारी नीति

भारत की विदेश नीति हमेशा से बहुत सोच-समझकर बनाई गई है. भारत की लगातार यही कोशिश होती है कि वह चीन और अमेरिका जैसी दोनों महाशक्तियों के बीच एक मजबूत संतुलन बनाकर चले. भारतीय कूटनीति इस बात का पूरा ख्याल रखती है कि दुनिया में ऐसा कोई भी गलत संदेश न जाए जिससे लगे कि भारत का किसी एक देश से रिश्ता दूसरे के खिलाफ है. भारत के लिए यह संतुलन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि चीन और अमेरिका दोनों ही भारत के बहुत बड़े कारोबारी साझेदार हैं और कई अहम आर्थिक मामलों में भारत की इन दोनों देशों पर बड़ी निर्भरता है. 

रणनीतिक और आर्थिक नुकसान

लेकिन अगर चीन और अमेरिका के बीच यह दोस्ती एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी में बदल जाती है, तो भारत के लिए आने वाले समय में बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. यदि ये दोनों महाशक्तियों आपस में हाथ मिला लेती हैं, तो भारत को रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक, तीनों ही मोर्चों पर कई बड़े जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है. इस नए वैश्विक गठजोड़ के कारण भारत को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ेगा, जिससे एशिया में भारत की स्थिति और उसकी विकास की रफ्तार दोनों ही काफी हद तक प्रभावित हो सकती हैं.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलेंगे हालात

अब तक अमेरिका हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और उसकी आक्रामकता को रोकने के लिए भारत को एक प्रमुख संतुलनकारी और मजबूत सैन्य शक्ति के रूप में देखता था. इसी रणनीतिक जरूरत के कारण अमेरिका भारत को अत्यधिक महत्व देता आ रहा था. लेकिन अगर अब अमेरिका और चीन के बीच आपसी सहमति बन जाती है और उनके रिश्ते सुधर जाते हैं, तो इस पूरे इलाके में भारत का रणनीतिक महत्व काफी कम हो सकता है. ऐसी स्थिति में अमेरिका वैश्विक मुद्दों पर भारत की राय की अनदेखी करना शुरू कर सकता है.

क्वाड समूह पर मंडराया संकट

चीन और अमेरिका की यह नई नजदीकी सीधे तौर पर क्वाड (Quad) जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समूहों की प्रभावशीलता को बेहद कमजोर कर सकती है. क्वाड समूह, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, उसका मुख्य उद्देश्य ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को नियंत्रित करना और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना था. यदि अमेरिका खुद ही चीन के साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ा देगा, तो क्वाड का पूरा आधार ही कमजोर पड़ जाएगा. इससे भारत को समुद्र में चीन के खिलाफ मिलने वाला रणनीतिक सुरक्षा कवच कमजोर हो सकता है. 

चाइना प्लस वन नीति को झटका

आर्थिक मोर्चे पर देखें तो चीन-अमेरिका की दोस्ती से भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सबसे बड़ा झटका लग सकता है. कोरोना काल के बाद से अमेरिका और तमाम पश्चिमी देश अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए चाइना प्लस वन की नीति पर चल रहे थे, जिसके तहत वे चीन से अपने कारखाने निकालकर भारत जैसे देशों में शिफ्ट कर रहे थे. लेकिन अगर अब अमेरिका और चीन के संबंध पूरी तरह सामान्य हो जाते हैं, तो तमाम वैश्विक निवेशक और बड़ी कंपनियां वापस चीन के विशाल, अनुभवी और सस्ते मैन्युफैक्चरिंग हब की ओर रुख कर सकती हैं.

भारतीय निर्यातकों की बढ़ेगी मुश्किल

पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने चीन के सामानों पर भारी आयात शुल्क (टैरिफ) लगा रखे थे, जिसका सीधा फायदा भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में मिल रहा था. लेकिन अब दोनों महाशक्तियों के बीच रिश्ते सुधरने से चीन पर लगे इन कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और टैरिफ में ढील दी जा सकती है. ऐसा होने पर चीनी उत्पाद एक बार फिर अमेरिकी बाजार में बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध हो जाएंगे. चीनी सामानों के सस्ते होने से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए बहुत कड़ी और असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा. 

सीमा पर चीन के अड़ियल तेवर

सुरक्षा के मोर्चे पर भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लेकर है. जब अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के साथ चीन के संबंध स्थिर और दोस्ताना हो जाएंगे, तो चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को बहुत अधिक सुरक्षित, आत्मविश्वास से भरा हुआ और ताकतवर महसूस करने लगेगा. ऐसी अनुकूल स्थिति का फायदा उठाकर लद्दाख और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में जारी सीमा विवादों पर चीन का रुख भारत के प्रति और अधिक आक्रामक, सख्त और अड़ियल हो सकता है, जिससे सीमा पर तनाव बढ़ जाएगा.

बहुध्रुवीय एशिया का टूटता सपना

भारत हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक बहुध्रुवीय एशिया (Multipolar Asia) और बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करता आया है, जहां सत्ता किसी एक या दो देशों के हाथ में न होकर कई बड़ी शक्तियों के बीच बंटी रहे ताकि संतुलन बना रहे. लेकिन अमेरिका और चीन की यह नई दोस्ती एशिया को सीधे तौर पर एक द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था (Bipolar System) की तरफ धकेल सकती है, जहां सिर्फ दो महाशक्तियां ही सारे फैसले करेंगी. यह द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक हितों के पूरी तरह खिलाफ साबित होगी.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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