Iceland Volcanoes: लोगों को ऐसा लगता है कि ज्वालामुखी सिर्फ वहीं हो सकती है जहां पर गर्मी ज्यादा हो. लेकिन ऐसा नहीं है. ज्वालामुखी धरती की कुछ सबसे ठंडी जगहों पर भी मौजूद है. इनमें अंटार्कटिका और आइसलैंड भी शामिल हैं.  दिलचस्प बात यह है कि इन बर्फीले इलाकों में बहने वाला लावा उतनी तेजी से ठंडा नहीं होता जितनी हम उम्मीद करते हैं. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे का विज्ञान.

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बर्फ की चादरों के नीचे ज्वालामुखी

जमे हुए इलाकों में ज्वालामुखी सच में होते हैं. अकेले अंटार्कटिका में ही 138 से ज्यादा ज्वालामुखी छिपे हुए हैं. इनमें से माउंट  एरेबस सबसे मशहूर और एक्टिव है. यह जीरो से काफी नीचे के तापमान के बावजूद अपनी लगातार लावा झील के लिए पहचाना जाता है. इसी के साथ आर्कटिक सर्कल के पास बसे आइसलैंड में तेज  टेक्टोनिक एक्टिविटी की वजह से आग और बर्फ एक साथ मौजूद हैं.

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लावा की बहुत ज्यादा गर्मी 

लावा के जल्दी ठंडा ना होने के पीछे की वजह इसका असाधारण तापमान है. लावा आमतौर पर 700 डिग्री सेल्सियस से 1200 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर फटता है.  बर्फ काफी ज्यादा ठंडी होने के बावजूद भी इस गर्मी को तुरंत खत्म नहीं कर सकती. जीरो से नीचे के माहौल में भी लावा को पूरी तरह से ठंडा होने में हफ्ते, महीने या कभी-कभी साल लग सकते हैं. 

जैसे ही लावा ठंडी हवा, बर्फ या पानी के संपर्क में आता है इसकी बाहरी सतह तेजी से ठंडी होकर सख्त हो जाती है. इससे एक ठोस परत बन जाती है. यह परत एक थर्मल कंबल की तरह काम करती है और अंदर की तेज गर्मी को फंसा लेती है. 

लावा गर्मी का खराब कंडक्टर 

पिघली हुई चट्टान गर्मी को काफी कुशलता से ट्रांसफर नहीं करती है. चट्टान गर्मी का खराब कंडक्टर है. इसका मतलब है कि गर्मी लावा प्रवाह के अंदर से बाहर की ओर काफी धीरे-धीरे जाती है. इस गुण की वजह से लावा की अंदरूनी परतें सतह के ठोस दिखने के काफी समय बाद भी पिघली हुई रह सकती है.

जब लावा बर्फ से मिलता है तो बर्फ तुरंत पिघल जाती है और भाप बन जाती है. हालांकि यह प्रक्रिया सतह को तेजी से ठंडा कर सकती है. लेकिन यह गहरी परतों पर काफी कम असर डालती है.

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