Moon Footprints: जब भी एस्ट्रोनॉट्स चांद पर जाते हैं तो वे अपनी मौजूदगी के निशान चांद पर छोड़कर आते हैं. वे चांद की धूल भरी सतह पर अपने पैरों के निशान छोड़कर आते हैं.  यह निशान कभी वहां से हटते नहीं बल्कि वहीं पर मौजूद रहते हैं. लेकिन आखिर इसके पीछे क्या वजह है कि वह निशान वहीं पर बने रहते हैं. आइए जानते हैं.

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एटमॉस्फियर नहीं होने की वजह 

चांद पर कोई एटमॉस्फियर नहीं है. इसका मतलब है कि वहां पर हवा नहीं है और मौसम का कोई सिस्टम नहीं है. धरती पर पैरों के निशान जल्दी गायब हो जाते हैं क्योंकि हवा जमीन पर धूल और रेत उड़ाती है. तूफान, हवा के झोंके और बदलती हवा धीरे-धीरे सतह के निशान को चिकना कर देती हैं. चांद पर ऐसा कुछ नहीं होता. हवा के बिना धूल ठीक वहीं रहती है. इस वजह से एस्ट्रोनॉट्स के छोड़ें पैरों के निशान बच जाते हैं. 

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पानी नहीं और कोई बारिश नहीं 

धरती की सतह पानी से लगातार बदलती रहती है. बारिश, नदी, बाढ़ और बहता ग्राउंडवाटर धीरे-धीरे मिट्टी और चट्टानों को काटता है. इस कुदरती प्रक्रिया को इरोजन कहते हैं. यह पक्का करता है कि धरती पर पैरों के निशान शायद ही ज्यादा समय तक टिकते हैं. हालांकि चांद पर ना तो लिक्विड पानी है और ना ही बारिश होती है. इस वजह से चांद की सतह काफी लंबे समय तक ज्यादातर वैसे ही रहती है. 

जियोलॉजिकल शांति 

धरती जियोलॉजिकली एक्टिव है. टेक्टोनिक प्लेट्स हिलती हैं ,भूकंप आते हैं और ज्वालामुखी फटते हैं. ये ताकतें लगातार ग्रह की सतह को बदलती रहती हैं. चांद काफी ज्यादा शांत है. इसमें धरती की तरह एक्टिव टेक्टोनिक प्लेट्स नहीं हैं. हालांकि छोटे-मोटे चांद के भूकंप आते हैं लेकिन वे धरती की भूकंपीय गतिविधि की तुलना में काफी कम और कमजोर होते हैं.

लूनर रेगोलिथ की भूमिका 

चांद की सतह रेगोलिथ नाम के एक महीन पाउडर जैसे पदार्थ से ढकी हुई है. यह धूल काफी सूखी और माइक्रोस्कोपिक लेवल पर दांतेदार होती है. जब एस्ट्रोनॉट्स ने इस पर पैर रखा तो रेगोलिथ दब गया और उनके बूट्स का आकार ले लिया. अब क्योंकि चांद पर इसे खराब करने के लिए कोई भी नमी या फिर हवा नहीं है इस वजह से यह निशान हमेशा बना रहा.

क्या पैरों के निशान कभी गायब होंगे?

हालांकि पैरों के निशान लंबे समय तक रहते हैं लेकिन वह पूरी तरह से परमानेंट नहीं होते. चांद पर लगातार छोटे स्पेस रॉक्स से हमले होते रहते हैं. लाखों सालों में स्पेस रॉक्स की वजह से चांद की सतह हिलती और बदलती है. साइंटिस्ट्स का अनुमान है कि इस धीमी प्रक्रिया की वजह से पैरों के निशान को पूरी तरह मिटने में लगभग 10 मिलियन से 100 मिलियन साल लग सकते हैं.

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