Dinesh Trivedi Bangladesh Ambassador: बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त के रूप में पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति ने कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है. एक करियर राजनयिक (IFS अधिकारी) के बजाय एक राजनेता को इस संवेदनशील पद पर भेजने के फैसले ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या कूटनीति अब केवल पेशेवरों तक सीमित है? पश्चिम बंगाल में चुनाव के बीच मोदी सरकार ने ममता सरकार के खिलाफ यह बड़ा दांव खेला है. लेकिन यहां यह जानना जरूरी है कि क्या कोई नॉन-डिप्लोमैट भी किसी देश का हाई-कमिश्नर बन सकता है, चलिए जानें.

नॉन डिप्लोमैट बन सकते हैं उच्चायुक्त?

यह समझना जरूरी है कि हाई-कमिश्नर या राजदूत का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है. हालांकि, अधिकांश मामलों में भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अनुभवी अधिकारियों को ही इन पदों के लिए चुना जाता है, लेकिन भारतीय संविधान और विदेश मंत्रालय के नियम सरकार को यह अधिकार देते हैं कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को मिशन प्रमुख नियुक्त कर सके जो देश के हितों की रक्षा करने में सक्षम हो. इस श्रेणी को 'नॉन-करियर डिप्लोमैट' कहा जाता है. इनका चयन अक्सर संबंधित देश के साथ विशिष्ट संबंधों को मजबूत करने या किसी बड़े राजनीतिक लक्ष्य को साधने के लिए किया जाता है.

कैसे होती है इनकी नियुक्ति?

जब सरकार किसी गैर-राजनयिक को उच्चायुक्त के रूप में चुनती है, तो प्रक्रिया उतनी ही आधिकारिक होती है, जितनी किसी करियर राजनयिक के लिए. इस नियुक्ति पर अंतिम मुहर भारत के राष्ट्रपति लगाते हैं, लेकिन इसका मूल निर्णय प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की सिफारिश पर आधारित होता है. योग्यता के मापदंडों में उस व्यक्ति का कूटनीतिक मिशन के प्रति अनुभव, उसकी राजनीतिक वरिष्ठता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ को आधार बनाया जाता है. वियना कन्वेंशन (1961) के तहत, जैसे ही इन नियुक्तियों को मेजबान देश द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, उन्हें पेशेवर राजनयिकों के समान ही पूर्ण राजनयिक प्रतिरक्षा (Diplomatic Immunity) और विशेषाधिकार प्राप्त हो जाते हैं.

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इतिहास में इससे पहले कब-कब हुआ ऐसा?

दिनेश त्रिवेदी पहले नॉन-डिप्लोमैट नहीं हैं, जिन्हें विदेश भेजा गया है. भारतीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां सरकार ने विशेषज्ञों और अनुभवी राजनेताओं पर भरोसा जताया है. 

  • पत्रकार कुलदीप नायर 1990 के दशक में यूके में भारत के उच्चायुक्त रहे, जो एक गैर-सरकारी और गैर-राजनयिक पृष्ठभूमि से थे. 
  • इसी तरह, प्रख्यात विधिवेत्ता और राजनेता डॉ. एल.एम. सिंघवी को भी यूके में उच्चायुक्त के रूप में कूटनीतिक कमान सौंपी गई थी. 
  • हाल के वर्षों में देखें, तो पूर्व आईपीएस अधिकारी अहमद जावेद को सऊदी अरब में भारत का राजदूत बनाया गया था. 
  • यहां तक कि न्यूजीलैंड जैसे देशों में पूर्व सैन्य अधिकारियों (एडमिरल) को भी भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है.

दिनेश त्रिवेदी का सियासी और प्रशासनिक सफर

दिनेश त्रिवेदी का नाम राजनीति में एक अनुभवी चेहरे के रूप में लिया जाता है. 4 जून, 1950 को जन्मे त्रिवेदी का करियर लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वे लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की राजनीति का हिस्सा रहे और बैरकपुर सीट से दो बार सांसद रहे. दिनेश त्रिवेदी भाजपा में आने से पहले टीएमसी के सांसद भी रहे हैं. वे केवल लोकसभा ही नहीं, बल्कि राज्यसभा के जरिए ऊपरी सदन का भी अनुभव रखते हैं. 

उनका सबसे चर्चित कार्यकाल रेल मंत्री के रूप में रहा, जहां उन्होंने 2012 में रेलवे को आर्थिक तंगी से उबारने के लिए किराया बढ़ाने का साहसी निर्णय लिया था. हालांकि, ममता बनर्जी इससे खुश नहीं थीं और राजनीतिक विरोध के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन वह कदम उनके आर्थिक अनुशासन और स्पष्टवादिता को दर्शाता था.

पश्चिम बंगाल की राजनीति और बांग्लादेश का समीकरण

दिनेश त्रिवेदी की यह नियुक्ति महज एक कूटनीतिक पदस्थापन नहीं, बल्कि इसे राजनीतिक चश्मे से भी देखा जा रहा है. पश्चिम बंगाल से आने वाले एक ऐसे नेता, जो टीएमसी से भाजपा में आए, उन्हें बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश में भेजना सरकार की सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है. बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते सांस्कृतिक, आर्थिक और सुरक्षा के लिहाज से बेहद जटिल हैं. पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए, वहां की स्थानीय राजनीति और पड़ोसी देश के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए एक बड़ी प्राथमिकता है. त्रिवेदी का वहां जाना निश्चित रूप से आने वाले चुनावी और कूटनीतिक समीकरणों पर असर डालेगा.

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