NEET Protest: नीट पेपर लीक मामले में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने यह मांग की है कि विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी मामले वापस ले लिए जाएं. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर भारतीय कानून के तहत एफआईआर को सीधे तौर पर मिटा देना क्या मुमकिन है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

Continues below advertisement

एकतरफा तरीके से नहीं हो सकता केस रद्द 

एक बार केस दर्ज हो जाने के बाद यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है और सरकार इसे किसी कार्यकारी आदेश से हटा या फिर नष्ट नहीं कर सकती. इसके बजाय आपराधिक कार्यवाही को वापस लेने का काम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के मुताबिक किया जाना चाहिए. 

Continues below advertisement

सरकारी वकील की भूमिका 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 360 के तहत सरकार सीधे तौर पर आपराधिक मामला वापस नहीं लेती है. इसके बजाय वह संबंधित सरकारी वकील को निर्देश देती है,  जो अदालत में मुकदमा वापस लेने की अनुमति मांगने के लिए लिखित आवेदन दाखिल करता है. इस कानूनी प्रक्रिया को मुकदमा वापस लेना कहा जाता है. 

अदालत की मंजूरी जरूरी 

इसके लिए आखिरी फैसला अदालत लेती है सरकार नहीं. मजिस्ट्रेट सरकारी वकील के आवेदन की जांच करते हैं और इस बात को तय करते हैं कि क्या मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने से जनहित सधता है और कानून व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिलती है.  अदालत की मंजूरी मिलने के बाद ही आरोपी को कानून के मुताबिक आरोपमुक्त या फिर बरी किया जा सकता है. 

यह भी पढ़ेंः भारत में कैसे तय होता है मुआवजा, सीजेपी की मांग के बीच जान लें नियम?

अपराध की प्रकृति मायने रखती है 

सरकारें आमतौर पर राजनीतिक या फिर सामाजिक विरोध प्रदर्शन से जुड़े छोटे और कम गंभीर अपराधों के मामलों को वापस लेने की कोशिश करती हैं. इनमें गैर कानूनी तरीके से इकट्ठा होना, ट्रैफिक रोकना या फिर शांति भंग करना जैसे आरोप शामिल हो सकते हैं. हालांकि अगर मामले में गंभीर अपराध शामिल हों जैसे कि किसी की जान जाना, गंभीर चोट आना या फिर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना तो अदालत आमतौर पर मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने में हिचकिचाती है. 

चार्ज शीट से पहले क्लोजर रिपोर्ट 

अगर पुलिस ने अभी तक चार्ज शीट दाखिल नहीं की है तो एक और कानूनी रास्ता मौजूद हो सकता है. ऐसी स्थिति में जांच एजेंसी अपनी जांच पूरी करने के बाद अदालत के सामने क्लोजर रिपोर्ट या फिर कैंसिलेशन रिपोर्ट पेश कर सकती है. अगर कोर्ट रिपोर्ट को मंजूरी दे देता है तो कार्यवाही खत्म हो जाती है.

यह भी पढ़ेंः भारत में NEET तो पाकिस्तान में MBBS करने के लिए कौन सी परीक्षा देनी होती है, वहां कौन करता है एग्जाम?