Dhar Bhojshala Dispute: किसने बनवाई थी धार भोजशाला, जिसे हाईकोर्ट ने बताया मंदिर; जानें इसका इतिहास
Dhar Bhojshala Dispute: धार भोजशाला पर हाईकोर्ट का फैसला आ चुका है. एएसआई की रिपोर्ट में यहां 94 हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और परमार कालीन सिक्के मिलने की पुष्टि हुई थी. अब एएसआई इसकी निगरानी करेगा.

- हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को मंदिर घोषित कर पूजा अधिकार दिया.
- एएसआई रिपोर्ट में 94 मूर्तियां, अवशेष और परमारकालीन सिक्के मिले.
- राजा भोज ने 1034 में संस्कृत शिक्षा केंद्र और मां सरस्वती मंदिर बनवाया.
- विभिन्न शासकों द्वारा क्षतिग्रस्त, मस्जिद में बदलने के प्रयास किए गए.
Dhar Bhojshala Dispute: मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला सदियों से आस्था, शिक्षा और संघर्ष का केंद्र रही है. हाईकोर्ट ने आज इस पर फैसला सुना दिया है. उच्च न्यायालय द्वारा इसे मंदिर करार देने और हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने के फैसले ने इस ऐतिहासिक स्थल को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. राजा भोज द्वारा स्थापित यह सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रतीक था. कोर्ट की टिप्पणी और एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने इस स्थल के मूल स्वरूप और इसके गौरवशाली अतीत पर मुहर लगा दी है, जिससे इसके विवादित ढांचे के पीछे छिपे वास्तविक मंदिर के साक्ष्य सार्वजनिक हो गए हैं.
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय और हिंदू पक्ष की जीत
धार की ऐतिहासिक भोजशाला पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला न्याय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है. अदालत ने स्पष्ट रूप से इसे मंदिर करार देते हुए हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार प्रदान कर दिया है. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में बहुत महत्वपूर्ण बात कही कि इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी. ऐतिहासिक साहित्यों और प्रमाणों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दर्ज किया कि यह विवादित क्षेत्र परमार वंश के राजा भोज के समय से ही संस्कृत शिक्षा का एक प्रतिष्ठित केंद्र था. यह फैसला उस लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है, जिसमें हिंदू पक्ष निरंतर इसे मां सरस्वती का मंदिर होने का दावा करता रहा था.
एएसआई की रिपोर्ट में मिले मंदिर के पुख्ता सबूत
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) ने भोजशाला परिसर के भीतर जो वैज्ञानिक सर्वे किया, उसकी रिपोर्ट चौंकाने वाली और तथ्यों से भरपूर थी. एएसआई को सर्वे के दौरान परिसर के भीतर से 94 मूर्तियां और प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष मिले. ये कलाकृतियां विभिन्न प्रकार के पत्थरों से बनी हुई हैं, जिन पर भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसे प्रमुख देवी-देवताओं की आकृतियां बहुत स्पष्टता के साथ उकेरी गई हैं. इसके अलावा, पत्थरों पर शेर, बाघ जैसे जानवरों और विभिन्न पक्षियों के चित्र भी मिले हैं. सबसे बड़ी कड़ी वे सिक्के हैं जो खुदाई के दौरान प्राप्त हुए; ये सिक्के परमार वंश के राजाओं के काल के हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस निर्माण का सीधा संबंध राजा भोज और उनके शासनकाल से था.
किसने बनवाई थी धार भोजनशाला?
इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि परमार वंश के सबसे प्रतापी राजा भोज ने साल 1034 में इस भव्य संरचना की नींव रखी थी. धार जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इस बात का उल्लेख है कि राजा भोज ने यहां एक बड़े महाविद्यालय (यूनिवर्सिटी) की स्थापना की थी, जिसे बाद में भोजशाला के नाम से ख्याति मिली. राजा भोज स्वयं ज्ञान, कला और साहित्य के महान संरक्षक थे, इसलिए उन्होंने इसे मां सरस्वती को समर्पित किया था. हालांकि, बाद के मुस्लिम आक्रांताओं और शासकों ने इस मंदिर के ढांचे को क्षतिग्रस्त कर इसे मस्जिद में बदलने का प्रयास किया, लेकिन मंदिर के प्राचीन अवशेष और खंभों पर उकेरी गई संस्कृत की इबारतें आज भी वहां की दीवारों में जीवित हैं.
परमार वंश का अटूट सांस्कृतिक कनेक्शन
भोजशाला केवल राजा भोज तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके उत्तराधिकारियों ने भी इस ज्ञान मंदिर की गरिमा को बनाए रखा. इतिहासकारों के अनुसार, राजा भोज के बाद परमार शासक उदयादित्य और नरवरमान ने भी इस परिसर की देखभाल की और इसमें विस्तार किया. भोजशाला के खंभों पर लगे शिलालेख इसकी गवाही देते हैं. एक शिला पर संस्कृत के दो विशेष पाठ लिखे हैं, जिनमें परमार राजाओं की स्तुति की गई है. साथ ही, कवि मदन के प्राचीन नाटक में भी इस स्थान का स्पष्ट वर्णन मां सरस्वती के मंदिर के रूप में मिलता है. यहां स्थापित वाग्देवी (सरस्वती) की मूल प्रतिमा 19वीं सदी के अंत में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाई गई थी, जो आज भी ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है.
भोजशाला का काला इतिहास
भोजशाला का इतिहास कई हमलों और परिवर्तनों का गवाह रहा है. साल 1305 में क्रूर शासक अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार इस शिक्षा के मंदिर पर हमला कर इसे नष्ट करने की कोशिश की. इसके बाद साल 1401 में दिलावर खान गौरी ने इसके एक हिस्से में मस्जिद का निर्माण करवा दिया. विनाश का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; साल 1514 में महमूद शाह खिलजी ने भोजशाला के शेष हिस्से को भी मस्जिद के स्वरूप में ढालने का प्रयास किया. साल 1875 में जब यहां ब्रिटिश मेजर किनकेड ने खुदाई करवाई, तब मिट्टी के नीचे दबी हुई माता सरस्वती की वह दिव्य प्रतिमा मिली जिसे अंग्रेज अपने साथ लंदन ले गए. तब से लेकर आज तक यह प्रतिमा भारत वापसी की प्रतीक्षा कर रही है.
वैज्ञानिक साक्ष्य और भविष्य की राह
एएसआई द्वारा पेश की गई रिपोर्ट और कोर्ट के आदेश ने अब यह साफ कर दिया है कि भोजशाला का मूल चरित्र हिंदू मंदिर का ही है. दीवारों पर मिले संस्कृत श्लोक, मूर्तियों के अवशेष और परमार कालीन वास्तुकला इस बात के जीवित प्रमाण हैं कि यह स्थान कभी महान राजा भोज की नगरी का बौद्धिक और धार्मिक केंद्र था. कोर्ट द्वारा पूजा का अधिकार दिए जाने के बाद अब हिंदू धर्मावलंबियों में हर्ष की लहर है. यह फैसला न केवल एक ऐतिहासिक स्थल की पहचान को वापस लौटाता है, बल्कि उन तथ्यों को भी सार्वजनिक करता है जिन्हें इतिहास के बोझ तले दबाने की कोशिश की गई थी.
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