10 अक्टूबर को दिल्ली में CJP प्रोटेस्ट के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेंट्रल दिल्ली के कई इलाकों में 24 घंटों के लिए सोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया था. सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि सोशल मीडिया पर कोई अफवाह न फैले और शांति बनी रहे. इंटरनेट बंद होने की इस खबर ने आज की पीढ़ी को एक बड़े सवाल पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है, आखिर जब दुनिया में इंटरनेट, सोशल मीडिया नहीं था, तब अफवाहें कैसे फैलती थीं, और तब बिना किसी डिजिटल ग्रुप के इतने बड़े-बड़े दंगे और बवाल कैसे हो जाते थे.

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मुंहजबानी बातें और गपशप

बिना इंटरनेट के दौर में अफवाहें फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम इंसान खुद था. किसी एक व्यक्ति ने कोई झूठी या बढ़-चढ़ाकर कही गई बात किसी चौराहे, दुकान या चाय के टपरी पर बैठे चार लोगों को बताई. उन चार लोगों के बिना किसी जांच-परख के उसे और मिर्च मसाला लगाकर आगे 8 लोगों को ट्रांसफर कर दिया. शाम होते-होते वह बात पूरे शहर में फैल जाती थी. इस तरीके को वर्ड ऑफ माउथ कहा जाता है. इनमें सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि बात जितने लोगों के मुंह से गुजरती थी, उसका स्वरूप उतना ही बदलता और खतरनाक होता जाता था.

हाट-बाजार, मेले और धार्मिक स्थल बने केंद्र

पुराने समय में गांव और कस्बों के लोग रोजाना एक-दूसरे से नहीं मिल पाते थे. ऐसे में साप्ताहिक हाट-बाजार, त्योहारों के मेले और धार्मिक स्थल वो जगहें थीं, जहां भारी संख्या में लोग जुटते थे. इन जगहों पर जब कोई सनसनीखेज खबर या अफवाह पहुंचती थी, तो वहां मौजूद  लोग उसे सच मान लेते थे. जब वे शाम को अपने-अपने गांवों को लौटते, तो वह झूठी अफवाह अपने साथ दर्जनों नए इलाकों में फैला देते थे. 

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पर्चों और पोस्टरों का खेल

इतिहास में कई दंगों और जी-जान से फैलाई गई अफवाहों के पीछे छपे हुए पर्चों का बहुत बड़ा हाथ रहा है. उपद्रवी तत्व रातों-रात किसी समुदाय या पार्टी के खिलाफ भड़काऊ बातें लिखकर पर्चे छपवाते थे. सुबह होते ही इन पर्चों को लोगों के घरों के बाहर, दीवारों पर या चौराहों पर फेंक दिया जाता था. क्योंकि उस समय जानकारी को तुरंत क्रॉस-चेक करने का कोई साधन नहीं था, लोग छपी हुई बात को सच मानकर गुस्से में आ जाते थे और हिंसा भड़क उठती थी. 

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चिट्ठियां और टेलिग्राफ का गलत इस्तेमाल

भले ही डाक सेवा टेलिग्राम आज के इंटरनेट जितने तेज नहीं थे, लेकिन उस दौर के हिसाब से यह संदेश भेजने के सबसे तेज माध्यम थे. दंगों की साजिश रचने वाले लोग कोड वर्ड या झूठी सूचनाएं लिखकर एक शहर से दूसरे शहर टेलिग्राम भेज देते थे. जब तक पुलिस या प्रशासन को भनक लगती, तब तक दूसरे शहर में भी माहौल खराब हो चुका होता था.

क्यों हो जाते थे दंगे?

इंटरनेट न होने का एक सबसे बड़ा नुकसान यह था कि प्रशासन के पास सच बताने का कोई तेज जरिया नहीं था. आज अगर कोई अफवाह फैलती है, तो सरकार या पुलिस सोशल मीडिया पर तुरंत Fact-check या खंडन कर देती है. लेकिन पुराने जमाने में सरकार को अपनी बात लाइडस्पीकर या अगले दिन के अखबारों के जरिए कहनी पड़ती थी. इस बीच जो कम्यूनिकेशन गैप पैदा होता था, उसका फायदा उपद्रवी तत्व उठाते थे. लोग डर और अनिश्चितता के माहौल में आकर बहक जाते थे और छोटी सी बात भी सांप्रदायिक या हिंसक रूप ले लेती थी.

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