National Emergency India: दिल्ली में पुलिस और अर्धसैनिक बल को तैनात किया गया है और हजारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है. एयरपोर्ट पर हिरासत में लिए जाने के बाद अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को रविवार को लगभग 24 घंटे की हिरासत के बाद रिहा कर दिया गया. राजधानी में हो रही प्रदर्शनों ने देश के माहौल को काफी गर्म कर दिया है. इसी बीच सवाल यह उठता है कि आखिर आज के समय में राष्ट्रीय आपातकाल लागू करना कितना मुश्किल है और 1975 के बाद से सिस्टम में क्या-क्या बदलाव आए हैं? आइए जानते हैं क्या हैं इन सवालों के जवाब.

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1975 के आपातकाल के दौरान क्या हुआ? 

25 जून 1975 को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार की सलाह पर आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की. नागरिक स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हो गई और राजनीतिक गतिविधियों को सीमित कर दिया गया.

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1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के जरिए सुरक्षा उपाय लागू किए. इन सुधारों का मकसद आपातकाल की शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल को रोकना और जवाबदेही को मजबूत करना था.

क्या आज भी लगाया जा सकता है आपातकाल? 

अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल से जुड़ा हुआ है. 44वें संशोधन के बाद आपातकाल की घोषणा तभी की जा सकती है जब युद्ध, बाहरी हमले या फिर सशस्त्र विद्रोह से भारत की सुरक्षा या फिर उसके किसी हिस्से को खतरा हो. पहले आंतरिक अशांति का जो आधार था उसे बदलकर सशस्त्र विद्रोह कर दिया गया. 

इसके बाद उन हालात का दायरा सीमित हो गया है जिनमें आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है. राजनीतिक विरोध, प्रदर्शन या फिर कानून व्यवस्था की आम समस्याएं राष्ट्रीय आपातकाल के लिए संवैधानिक जरूरत को अपने आप पूरा नहीं करतीं.

केंद्रीय मंत्रिमंडल से लिखित मंजूरी 

राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा तब तक नहीं कर सकते जब तक की केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश के जरिए यह फैसला ना लिया जाए. इससे प्रधानमंत्री को अकेले फैसला लेने से रोका जाता है और असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करने से पहले सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत होती है.

संसद से घोषणा को मंजूरी मिलना जरूरी है 

राष्ट्रीय आपातकाल को एक महीने के अंदर संसद की मंजूरी मिलनी चाहिए. लोकसभा और राज्यसभा दोनों को इसे खास बहुमत से मंजूर करना होगा. यानी सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्यों का समर्थन.

 जब यह मंजूर हो जाता है, तो आपातकाल एक बार में 6 महीने तक लागू रहता है. इसे आगे बढ़ाने के लिए हर बार उसी खास बहुमत से संसद की मंजूरी लेना जरूरी होता है. इसे बार-बार मंजूरी मिले बिना कानूनी तौर पर हमेशा के लिए जारी नहीं रखा जा सकता. 

कौन से मौलिक अधिकार सुरक्षित रहते हैं? 

44वें संशोधन ने मौलिक अधिकारों के लिए सुरक्षा उपायों को काफी मजबूत किया. अनुच्छेद 20 जो आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने के संबंध में व्यक्तियों की रक्षा करता है और अनुच्छेद 21 जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है उन्हें राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 359 के तहत किसी आदेश से निलंबित नहीं किया जा सकता. हालातों के आधार पर संविधान के आपातकालीन प्रावधानों के तहत दूसरे अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. 

क्या अदालतें आपातकाल की समीक्षा कर सकती हैं?

आपातकाल की घोषणा न्यायिक जांच के दायरे में आती है. अदालत इस बात की जांच कर सकती हैं कि क्या संवैधानिक जरूरत को पूरा किया गया है और क्या फैसले को अमान्य करने के लिए कानूनी रूप से माननीय आधार मौजूद हैं.  याचिका दायर करने से आपातकाल अपने आप रद्द नहीं हो जाता. यह दखल कानूनी आधार और सबूतों पर ही निर्भर करता है.

क्या बिना घोषित आपातकाल भी वैसा ही होता है?

आलोचक कभी-कभी विरोध प्रदर्शन, मीडिया की आजादी, इंटरनेट तक पहुंच या फिर राजनीतिक गतिविधियों पर लगी पाबंदियों को बताने के लिए बिना घोषित आपातकाल शब्द का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल यह एक राजनीतिक अभिव्यक्ति है और अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल के बारे में इसकी कोई अलग संवैधानिक श्रेणी नहीं है. 

व्यक्तिगत पाबंदियां गंभीर कानूनी सवाल खड़े कर सकती हैं लेकिन उनका आकलन संबंधित कानूनों और अधिकारों के तहत किया जाना चाहिए. सिर्फ उनके होने से यह साबित नहीं होता कि औपचारिक राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया है. 

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1975 के बाद से भारत कैसे बदला? 

भारत में अब मजबूत सुरक्षा उपाय हैं. सीमित आधार, कैबिनेट की लिखित मंजूरी, संसद में विशेष बहुमत, समय-समय पर नवीनीकरण और मुख्य मौलिक अधिकारों की सुरक्षा. ये उपाय मनमाने इस्तेमाल को मुश्किल बनाते हैं. हालांकि कोई भी संवैधानिक व्यवस्था गलत इस्तेमाल की हर संभावना को खत्म नहीं करती.

आखिरकार आपातकालीन शक्तियां संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही के दायरे में रहनी चाहिए. यह सुरक्षा उपाय न सिर्फ लिखित प्रावधानों पर निर्भर करते हैं बल्कि संसद, न्यायपालिका, सार्वजनिक संस्थाओं और नागरिकों पर भी निर्भर करते हैं कि वे संविधान का सम्मान किया जाने पर जोर दें.

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