जैसे-जैसे उत्तर भारत में गुलाबी ठंड ने अपनी दस्तक देनी शुरू की है, वैसे-वैसे देश की राजधानी दिल्ली की आबोहवा एक बार फिर से जहरीली और सांस लेने लायक नहीं बची है. हवा की गुणवत्ता में लगातार आ रही इस भयंकर गिरावट से निपटने के लिए प्रशासन ने तुरंत प्रभाव से ग्रेप-वन यानी जीआरएपी का पहला चरण लागू कर दिया है, ताकि बढ़ते प्रदूषण पर लगाम कसी जा सके. बुधवार को सुबह के समय यहां का एयर क्वालिटी इंडेक्स AQI 200 से ऊपर दर्ज किया गया, जिसे खराब श्रेणी में गिना जाता है. आखिर क्या वजह है कि हर साल सर्दियां आते ही दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो जाती है, आइए इस पूरी रिपोर्ट में समझते हैं.

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ठंडी हवा और सर्दियों का खेल

सर्दियों के मौसम में जैसे-जैसे तापमान में भारी गिरावट आती है, वैसे-वैसे वातावरण की हवा ठंडी होकर काफी भारी होने लगती है. गर्म हवा की प्रकृति ऊपर उठने की होती है, लेकिन ठंडी और भारी हवा हमेशा जमीन की सतह के पास ही बैठ जाती है, जिससे हवा की ऊपर उठने वाली गति धीमी पड़ जाती है. इस मौसमी बदलाव के कारण फैक्ट्रियों, गाड़ियों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले जहरीले कण वातावरण में ही फंसकर रह जाते हैं और चाहकर भी ऊपर नहीं जा पाते हैं, जो बाद में इंसानों के फेफड़ों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं.

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नमी की कमी और तापमान का उल्टा चक्र

आम दिनों की तुलना में सर्दियों की हवा में नमी की मात्रा काफी कम पाई जाती है, जबकि नमी ही वह प्राकृतिक कारक है जो धूल और धुएं के कणों को आपस में चिपकाकर जमीन पर गिराने का काम करती है. नमी न होने के कारण ये सूक्ष्म कण लंबे समय तक हवा में ही तैरते रहते हैं. इसके अलावा इस मौसम में इंवर्जन यानी तापमान के उलटने की एक अजीब स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें ऊपर की गर्म हवा नीचे की ठंडी हवा को एक ढक्कन की तरह दबा लेती है. इसके चलते सारा प्रदूषण जमीन के करीब ही कैद होकर रह जाता है और कोहरे के साथ मिलकर एक जानलेवा चादर बना लेता है.

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हवा की धीमी रफ्तार और पराली का धुआं

गर्मियों के दिनों में हवा का घनत्व कम और तापमान बहुत ज्यादा होता है, जिससे प्रदूषण के कण आसानी से वातावरण की ऊपरी परतों में तैरते हुए दूर निकल जाते हैं. इसके विपरीत, सर्दियों में हवा की चाल बेहद सुस्त हो जाती है और हवा का घनत्व बढ़ जाता है, जिससे प्रदूषण एक ही जगह पर टिककर और अधिक घना हो जाता है. इस प्राकृतिक मार के ऊपर से ग्रामीण इलाकों में किसानों द्वारा जलाई जाने वाली पराली का धुआं, ग्रामीण घरों में जलने वाले लकड़ी-गोबर के उपले और उद्योगों से निकलने वाला अतिरिक्त कचरा इस हवा को पूरी तरह जहरीला बना देता है.

वाहनों का बढ़ता दबाव और स्वास्थ्य पर असर

ठंड से बचने के लिए लोग पैदल या दोपहिया वाहनों की जगह अपनी चार पहिया गाड़ियों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं, जिससे सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव कई गुना बढ़ जाता है. गाड़ियों के साइलेंसर से निकलने वाला जहरीला धुआं इस ठंडे मौसम में सीधे लोगों की सांसों के जरिए उनके शरीर के अंदर पहुंचकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और गंभीर फेफड़ों की बीमारियों का कारण बनता है. भारत के बाकी महानगरों की तुलना में दिल्ली में भौगोलिक स्थिति और इन तमाम मानवीय कारणों के मेल से प्रदूषण का स्तर सबसे खतरनाक बिंदु पर पहुंच जाता है, जिससे आम जनता का जीना मुहाल हो जाता है.

सरकार के प्रयास और ग्रेप-वन की पाबंदियां

बिगड़ते हालातों को काबू में करने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने कड़े कदम उठाते हुए जीआरएपी का पहला चरण सक्रिय कर दिया है, जिसके तहत निर्माण कार्यों पर नियंत्रण, धूल रोकने के लिए पानी का छिड़काव और ट्रैफिक नियमों का कड़ाई से पालन कराया जा रहा है. सरकार और प्रशासन अपने स्तर पर हरसंभव प्रयास में जुटे हैं ताकि हवा के इस जहर को कम किया जा सके, लेकिन जब तक स्थानीय स्तर पर लोग खुद जागरूक होकर निजी वाहनों का कम इस्तेमाल नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या से पूरी तरह निजात पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा.

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