Nepotism In Congress Vs Bjp: बाप-बेटा और पोता... बीजेपी या कांग्रेस, किस पार्टी में ज्यादा हावी है परिवारवाद?
Nepotism In Congress Vs Bjp: भारतीय राजनीति में परिवारवाद की बहस कांग्रेस-भाजपा दोनों के इर्द-गिर्द घूमती है. कांग्रेस पर गांधी परिवार के वर्चस्व का आरोप है, वहीं भाजपा पर भी आरोप लगने शुरू हो गए हैं.

- एनडीए सहयोगियों में परिवारवाद का असर अधिक खुलकर सामने आता है.
Nepotism In Congress Vs Bjp: भारत की राजनीति में परिवारवाद यानी एक ही परिवार के कई सदस्यों का सत्ता और टिकट पर असर, लंबे समय से बहस का मुद्दा रहा है. खासकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नामों के चलते कांग्रेस पर यह आरोप ज्यादा लगता है, लेकिन 2024 के बाद के राजनीतिक हालात बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी भी इस बहस से पूरी तरह बाहर नहीं है. आइए जानें कि किस पार्टी में परिवारवाद ज्यादा हावी है.
कांग्रेस में परिवारवाद का मजबूत आधार
कांग्रेस में परिवारवाद की चर्चा सबसे ज्यादा इसलिए होती है, क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर नेहरू-गांधी परिवार का दशकों से प्रभाव रहा है. आजादी के बाद से जवाहरलाल नेहरू से शुरू होकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और फिर सोनिया-राहुल-प्रियंका तक यह सिलसिला लगातार बना रहा है. इसी वजह से कांग्रेस पर टॉप लेवल फैमिली कंट्रोल का आरोप सबसे ज्यादा लगता है.
राज्यों में भी दिखता है परिवार का असर
कांग्रेस में सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व ही नहीं, बल्कि राज्यों में भी कई जगह बाप-बेटा या रिश्तेदारों को टिकट मिलने के उदाहरण मिलते हैं. 2024 के कर्नाटक चुनाव में कई सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे गए जो किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े थे. यह ट्रेंड बताता है कि पार्टी में जमीनी स्तर पर भी परिवार आधारित राजनीति मजबूत बनी हुई है.
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आलोचना और क्या है पार्टी का पक्ष?
बीजेपी और अन्य विरोधी दल कांग्रेस पर आरोप लगाते हैं कि वहां योग्यता से ज्यादा सरनेम चलता है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि ये नेता जनता के बीच लंबे समय से काम कर रहे हैं और उन्हें जनता का भरोसा मिला है. पार्टी इसे अनुभव और स्वीकार्यता का मामला बताती है, न कि सिर्फ परिवारवाद.
परिवारवाद पर बीजेपी का दावा
बीजेपी लंबे समय से खुद को परिवारवाद के खिलाफ पार्टी बताती रही है. अमित शाह और अन्य नेताओं ने कई बार सार्वजनिक तौर पर इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरा है, लेकिन 2024 के बाद के चुनावों में बीजेपी के भीतर भी कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां नेताओं के बच्चों या रिश्तेदारों को टिकट दिया गया.
स्थानीय राजनीति में बढ़ता ट्रेंड
बीजेपी में परिवारवाद का असर राष्ट्रीय स्तर पर कम दिखता है, लेकिन राज्य और स्थानीय स्तर पर इसका दायरा बढ़ा है. कई जगह पुराने नेताओं के बेटे-बेटियों को टिकट दिया गया, खासकर वहां जहां परिवार का स्थानीय प्रभाव मजबूत है. इससे यह साफ होता है कि जीत की संभावना के हिसाब से पार्टी भी व्यावहारिक फैसले ले रही है.
NDA सहयोगियों में ज्यादा असर
बीजेपी के सहयोगी दलों में परिवारवाद और ज्यादा खुलकर दिखता है. बिहार में जेडीयू, निषाद पार्टी जैसे दलों में कई नेताओं के परिवार के लोग सक्रिय राजनीति में हैं. चूंकि ये दल एनडीए का हिस्सा हैं, इसलिए अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी पर भी इसका असर जुड़ जाता है.
परिवारवाद से कौन ज्यादा प्रभावित?
अगर तुलना की जाए तो कांग्रेस में परिवारवाद ज्यादा संस्थागत यानी सिस्टम का हिस्सा दिखता है, खासकर शीर्ष नेतृत्व में. वहीं बीजेपी में यह ज्यादा केस-बाय-केस आधार पर दिखता है, यानी जहां जरूरत पड़ी वहां टिकट दिया गया. इसलिए यह कहना कि सिर्फ एक ही पार्टी में परिवारवाद है, पूरी तरह सही नहीं होगा.
लोकतंत्र बनाम वंशवाद की बहस
यह मुद्दा सिर्फ बीजेपी या कांग्रेस तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की बहस का हिस्सा है. एक पक्ष इसे लोकतंत्र के खिलाफ मानता है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि अगर जनता वोट देती है तो वही अंतिम फैसला है. इस बहस का कोई एक सीधा जवाब अभी तक तय नहीं हो पाया है.
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