No Confidence Motion: विपक्ष लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में जुट चुका है. विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने विपक्ष के नेता को सदन में बोलने के मौके नहीं दिए और साथ ही कार्यवाही के संचालन में भी पक्षपात दिखाया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि अतीत में ऐसे प्रस्ताव कब लाए गए थे.

सबसे ताजा मामला 

कांग्रेस और कई विपक्षी पार्टियों ने ओम बिरला के खिलाफ एक प्रस्ताव लाने का फैसला किया है. विपक्षी नेताओं के मुताबिक यह फैसला बार-बार होने वाले व्यवधान, बोलने की चुनिंदा अनुमति और महिला सांसदों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार के आरोपों की वजह से लिया गया है. प्रस्ताव को औपचारिक रूप से पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर इकट्ठा करने की प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया है. यदि इसे स्वीकार कर लिया जाता है तो यह मौजूदा लोकसभा स्पीकर को हटाने के प्रयास का सबसे हालिया मामला बन जाएगा. 

सबसे पहला मामला 

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव 18 दिसंबर 1954 को भारत के पहले स्पीकर जी वी मावलंकर के खिलाफ लिया गया था. यह प्रस्ताव विपक्षी नेता सुचेता कृपलानी और बाकी सांसदों द्वारा पेश किया गया था. कई मजबूत तर्कों के बावजूद भी प्रस्ताव निर्णायक रूप से हार गया. 

हुकुम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव 

एक और प्रयास 1966 में हुकुम सिंह के खिलाफ हुआ था. उन्होंने राजनीतिक रूप से अशांत दौर में सेवा की थी. विपक्षी पार्टियों ने उन पर पक्षपात पूर्ण आचरण का आरोप लगाया लेकिन प्रस्ताव सफल नहीं हो सका. 

बलराम जाखड़ के खिलाफ कदम 

आठवीं लोकसभा के दौरान 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ भी कदम उठाया गया था. उस समय राजनीतिक तनाव काफी ज्यादा था लेकिन प्रस्ताव को पारित होने के लिए पर्याप्त समर्थन ही नहीं मिल सका. जाखड़ अपने पद पर बने रहे. जिस वजह से यह पैटर्न मजबूत हुआ कि ऐसे प्रस्ताव शायद ही कभी असल में पद से हटाने में बदलते हैं.

संविधान क्या कहता है 

लोकसभा स्पीकर को हटाने का नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 (c) के तहत आता है. इस प्रावधान के अंदर स्पीकर को पद से हटाने के लिए एक औपचारिक प्रस्ताव लाना जरूरी है. संविधान स्पीकर के पद की निष्पक्षता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सुरक्षा उपाय करता है. आपको बता दें कि ऐसे प्रस्ताव लाने से पहले कम से कम 14 दिन का नोटिस देना जरूरी है. उससे भी जरूरी बात यह है कि प्रस्ताव उस समय लोकसभा की कुल सदस्यता के प्रभावी बहुमत से पास होना चाहिए.

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