प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बुधवार को राजधानी में अंगदान को बढ़ावा देने के लिए स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन प्लेटफॉर्म लॉन्च किया. इस मौके पर उन्होंने खुद भी अपने अंगदान करने का संकल्प लिया, जिसमें दिल, लिवर, किडनी और आंखों समेत कुल 14 अंग और टिश्यू शामिल हैं. 

Continues below advertisement

इस पहल के जरिए दिल्ली सरकार लोगों को अंगदान के लिए जागरूक करना चाहती है, ताकि ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों की जान बचाई जा सके. लेकिन जब किसी की मौत के बाद उसके अंग दान होते हैं, तो यह अंग किस मरीज को मिलेगा, यह फैसला आखिर कौन और कैसे लेता है, आइए इसकी पूरी प्रक्रिया समझते हैं.

कौन सी संस्था करती है अंगों का आवंटन?

भारत में अंगों के आवंटन का पूरा सिस्टम ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन के जरिए चलता है, जो केंद्रिय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करता है. इसके नीचे रीजनल स्तर पर रोटो और राज्य स्तर पर सोटो जैसी संस्थाएं काम करती है. यह पूरा नेटवर्क मिलकर देशभर के अस्पतालों, मरीजों की वेटिंग लिस्ट और उपलब्ध अंगों के बीच तालमेल बिठाने का काम करता है, ताकि किसी भी अंग का सही और तेज इस्तेमाल हो सके. 

Continues below advertisement

किन बातों के आधार पर तय होता है मरीज?

अंग किस मरीज को मिलेगा, यह तय करने के लिए कई पैमाने अपनाए जाते हैं. सबसे पहले ब्लड ग्रुप का मिलान देखा जाता है, इसके बाद मरीज की बीमारी कितनी गंभीर है यानी मेडिकल अर्जेंसी को अहमियत दी जाती है. इसके साथ ही वेटिंग लिस्ट में मरीज कितने समय से इंतजार कर रहा है, अंग का साइज और उम्र का मिलान, और यह भी देखा जाता है कि दानकर्ता और मरीज का शरीर का साइज कितना समान है. बच्चों के मामले में एक अलग नियम भी लागू होता है, अगर किसी बच्चे यानी 18 साल से कम उम्र के डोनर का अगं मिलता है, तो उसे पहले किसी बच्चे मरीज को ही देने की कोशिश की जाती है. 

यह भी पढ़ें: जहरीली हवा से बढ़ा सुसाइड का खतरा, रिसर्च हुआ चौंकाने वाला खुलासा

पहले शहर फिर राज्य, फिर पूरे देश में तलाश

किसी भी अंग को ज्यादा से ज्यादा असरदार बनाए रखने के लिए उसे जल्द से जल्द ट्रांसप्लांट करना जरूरी होता है, इसलिए आवंटन प्रक्रिया में पहले उसी शहर की वेटिंग लिस्ट देखी जाती है. अगर वहां कोई मरीज नहीं मिलता, तो राज्य स्तर पर तलाश की जाती है, और उसके बाद भी बात न बने तो रीजनल और आखिर में पूरे देश स्तर पर मरीज ढूंढा जाता है. यही वजह है कि कई बार अंग को एक शहर से दूसरे शहर तक ग्रीन कॉरिडोर बनाकर बेहद तेजी से पहुंचाया जाता है. 

महिलाओं और डोनर परिवार को मिलती है प्राथमिकता

हाल ही में नोटो में अपने आवंटन नियमों में एक अहम बदलाव किया है, जिसके तहत वेटिंग लिस्ट में मौजूद महिला मरीजों और किसी डोनर के करीबी रिश्तेदारों को अतिरिक्त प्राथमिकता दी जाती है. इसका मकसद अंगदान से जुड़े जेंडर गैप को कम करना और ज्यादा लोगों को अंगदान के लिए प्रोत्साहित करना है. इसके अलावा एक सुपर अर्जेंट कैटेगरी भी होती है, जिसमें मरीज की हालत इतनी नाजुक हो कि उसे तुरंत अंग की जरूरत हो ऐसे मामलों में उसे तत्काल अंग उपलब्ध कराया जाता है. 

यह भी पढ़ें: दिल्ली की हवा में घुला नया जहर, हुआ चौंकाने वाला खुलासा