दुनिया की सबसे बड़ी आबादियों में शामिल चीन आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत ही उसकी कमजोरी बनती दिख रही है. जन्मदर लगातार गिर रही है, आबादी घट रही है और समाज तेजी से बूढ़ा हो रहा है. सरकार तमाम कोशिशें कर रही है, लेकिन नतीजे उम्मीद के उलट जा रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह स्थिति चीन के भविष्य के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है? 

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चीन में जन्मदर क्यों बन गई चिंता का विषय?

भारत के पड़ोसी देश चीन में जन्मदर अब ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच चुकी है. पिछले साल देश में सिर्फ 79.2 लाख बच्चों का जन्म हुआ, जो 1949 के बाद सबसे कम संख्या मानी जा रही है. उस साल पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई थी और तभी से जनसंख्या के आधिकारिक आंकड़े रखे जाने लगे थे. जन्मदर प्रति हजार आबादी पर सिर्फ 5.63 रही, जो साफ दिखाती है कि नए बच्चों की संख्या कितनी तेजी से घट रही है.

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लगातार चौथे साल घटती आबादी

जन्मदर में गिरावट का असर कुल जनसंख्या पर भी साफ नजर आ रहा है. 2025 में चीन की आबादी करीब 33.9 लाख कम हो गई. यह गिरावट 2022 से लगातार चौथे साल दर्ज की गई है. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल करीब 1.13 करोड़ लोगों की मौत हुई, जबकि जन्म उससे कहीं कम रही. यही वजह है कि कुल जनसंख्या का ग्राफ नीचे की ओर जा रहा है.

एक साल में 17 फीसदी की बड़ी गिरावट

चीन के लिए सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ एक साल में बच्चों के जन्म की संख्या में करीब 17 प्रतिशत की गिरावट आई है. 2025 में जन्मे बच्चों की संख्या पिछले साल के मुकाबले करीब 16.2 लाख कम रही. विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट सिर्फ अस्थायी नहीं है, बल्कि एक गहरे जनसांख्यिकीय संकट की ओर इशारा कर रही है.

लोग बच्चे क्यों नहीं कर रहे?

इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं. चीन में बच्चों को पालना-पोसना बेहद महंगा हो चुका है. शिक्षा, स्वास्थ्य और रहने का खर्च लगातार बढ़ रहा है. इसके साथ ही युवाओं पर करियर का दबाव भी काफी है. नौकरी का भविष्य अस्थिर होने की वजह से युवा दंपति परिवार बढ़ाने से हिचक रहे हैं. इसके अलावा ‘4-2-1 फैमिली स्ट्रक्चर’ भी एक बड़ी वजह है, जिसमें पति-पत्नी दोनों अकेले बच्चे होते हैं और उन पर चार बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में बच्चे पैदा करने का फैसला और मुश्किल हो जाता है. 

शादी की दर भी ऐतिहासिक निचले स्तर पर

जन्मदर गिरने की एक बड़ी वजह यह भी है कि चीन में शादियां कम हो रही हैं. शादी की दर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है और देर से शादी या शादी न करने का चलन बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर बच्चों की संख्या पर पड़ रहा है.

सरकार के उपाय, लेकिन नतीजे कमजोर

चीन सरकार ने जन्मदर बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं. 1 जनवरी से लागू नई नीति के तहत तीन साल से कम उम्र के हर बच्चे के लिए परिवार को करीब 500 डॉलर सालाना की सब्सिडी दी जा रही है. सरकारी किंडरगार्टन की फीस पहले ही माफ की जा चुकी है. इसके साथ ही सरकार ने कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक साधनों पर 13 प्रतिशत वैट भी लगा दिया है, जो पहले टैक्स-फ्री थे. मकसद साफ है, लोगों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना. बावजूद इसके, हालात में खास सुधार नहीं दिख रहा है. 

दुनिया के सबसे कम जन्मदर वाले देशों में चीन

इन तमाम प्रयासों के बावजूद, 2023 में चीन दुनिया के सबसे कम जन्मदर वाले टॉप 10 देशों में शामिल रहा. विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, इस सूची में चीन-जापान के ठीक बाद आता है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सिर्फ आर्थिक प्रोत्साहन से यह समस्या हल नहीं होगी.

तेजी से बूढ़ा हो रहा समाज

स्थिति को और गंभीर बनाती है चीन की तेजी से बूढ़ी होती आबादी. फिलहाल देश की करीब 23 प्रतिशत आबादी 60 साल से अधिक उम्र की है. ऐसे में अनुमान है कि 2035 तक बुजुर्गों की संख्या 40 करोड़ तक पहुंच सकती है. इसका मतलब है कि कामकाजी उम्र की आबादी घटेगी और पेंशन व स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा.

भविष्य के लिए कितना खतरनाक?

संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो चीन की आबादी 2100 तक घटकर करीब 80 करोड़ हो सकती है. इसका सीधा असर देश की आर्थिक रफ्तार, श्रमबल और वैश्विक ताकत पर पड़ेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संकट चीन के लिए सिर्फ जनसंख्या का नहीं, बल्कि पूरे विकास मॉडल का इम्तिहान है.

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