चीन लंबे समय तक अपनी ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ के लिए जाना गया. यहां दशकों तक एक से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर सख्त पाबंदी रही. अब उसी नीति का असर चीन को परेशान कर रहा है. देश की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और जन्म दर लगातार गिर रही है. सरकार चाहती है कि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करें, लेकिन युवा पीढ़ी इससे दूर भाग रही है. चीन की शी जिनपिंग सरकार ने घटती जनसंख्या से निपटने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है. 

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1 जनवरी से गर्भनिरोधक दवाओं और उपकरणों पर मिलने वाली टैक्स छूट खत्म कर दी गई है. अब कंडोम और गर्भनिरोधक गोलियों पर 13 प्रतिशत वैल्यू एडेड टैक्स लगाया जा रहा है. आइए जानें कि किन किन देशों में कंडोम लग्जरी आइटम बन चुका है.

दुनिया में कंडोम का अलग-अलग महत्व

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कई देशों में बढ़ती आबादी और यौन रोगों को रोकने के लिए सरकारें सुरक्षित यौन संबंधों पर जोर देती हैं. अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में सरकारें मुफ्त कंडोम तक बांटती हैं ताकि एचआईवी और अनचाही प्रेग्नेंसी को रोका जा सके. आम तौर पर कंडोम को सस्ता और आसानी से उपलब्ध साधन माना जाता है.

वेनेजुएला में कंडोम बना लग्जरी

हालांकि दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं जहां कंडोम खरीदना आम लोगों के लिए बेहद मुश्किल है. वेनेजुएला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां आर्थिक संकट और महंगाई ने हालात ऐसे कर दिए हैं कि कंडोम के एक पैकेट की कीमत 60 हजार तक पहुंच जाती है. कई बार लोगों की आधी सैलरी सिर्फ गर्भनिरोधक साधनों पर खर्च हो जाती है.

महंगाई की वजह क्या है

वेनेजुएला में गर्भपात पूरी तरह गैरकानूनी है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है. ऐसे में लोग जेल जाने के डर से महंगे दाम चुकाकर भी कंडोम खरीदना बेहतर समझते हैं. इसके अलावा विदेशी मुद्रा की कमी, आयात पर निर्भरता और बेकाबू महंगाई ने कंडोम जैसी जरूरी चीज को भी लग्जरी बना दिया है.

अन्य देशों में हालात

कुछ अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों में भी टैक्स, आयात शुल्क और कमजोर सप्लाई चेन की वजह से कंडोम के दाम ज्यादा हैं. वहीं यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में कंडोम आसानी से और अपेक्षाकृत सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं, क्योंकि वहां सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाती है.

बढ़ता वैश्विक बाजार

दुनियाभर में कंडोम की मांग लगातार बढ़ रही है. सुरक्षित यौन संबंधों के प्रति जागरूकता बढ़ने से इसका बाजार भी फैल रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, 2022 में वैश्विक कंडोम बाजार करीब 8.38 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था. अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 13.06 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है.

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