एक ही छत के नीचे सैकड़ों लोगों का आशियाना, चीन के इन डोनट जैसे घरों की बेहद दिलचस्प है कहानी
चीन के कुछ गांवों में में पहले के जमाने में डोनट के आकार के बहुत मजबूत घर बनाए जाते थे. ये आज भी भूकंप, बारिश और बदलते मौसम में भी सीना ताने खड़े हैं.

क्या आपने कभी किसी ऐसे रिहायशी घर की कल्पना की है, जो आसमान से देखने पर किसी विशाल डोनट की तरह से नजर आता हो? बाहर से देखने पर यह किसी अभेद्य मजबूत किले की तरह से दिखता है, लेकिन इसके अंदर एक या दो नहीं बल्कि लगभग 800 लोग मिलजुल कर एकसाथ रहते हैं. चीन के ग्रामीण इलाकों में सदियों पहले बने ये अनोखे और गोलाकार घर आज भी पूरी दुनिया के पर्यटकों और वास्तुकला के जानकारों को हैरान कर देते हैं. इन ऐतिहासिक इमारतों को फुजियान तुलू के नाम से जानते हैं, जिनका निर्माण मुख्य रूप से हक्का समुदाय के लोगों को अपनी सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखने के लिए किया गया था.
आखिर किसलिए डोनट शेप में बनाए गए थे घर?
यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि इन विशाल इमारतों को गोल आकार में ढालने के पीछे एक बेहद खास और कूटनीतिक वजह छिपी हुई थी. प्राचीन काल में चीन के इन गांवों पर स्थानीय डाकुओं और बाहरी दुश्मनों के अचानक हमले का खतरा हमेशा मंडराता रहता था. इसी डर से निपटने के लिए तुलू की बाहरी दीवारों को मिट्टी से बहुत ज्यादा मोटा बनाया जाता था. सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए पूरी इमारत में सिर्फ एक मजबूत मुख्य प्रवेश द्वार होता था और भूतल यानी नीचे की तरफ खिड़कियां बिल्कुल नहीं बनाई जाती थीं. इस बेजोड़ बनावट के कारण दुश्मनों के लिए इस इंसानी किले के अंदर घुसना नामुमकिन हो जाता था और लोग अंदर सुरक्षित रहते थे.
एक ही छत के नीचे सैकड़ों लोगों का संसार
फुजिान तुलू की सबसे बड़ी और बेजोड़ खासियत यह थी कि इसमें एक बहुत बड़ा संयुक्त परिवार एक साथ रहता था. कुछ बड़े तुलू के अंदर तो करीब 800 लोगों के रहने की बेहतरीन व्यवस्था मौजूद थी, जिसमें दादा-दादी, माता-पिता, बच्चे और उनके तमाम सगे-संबंधी शामिल होते थे. हर एक परिवार को इमारत में ऊपर से लेकर नीचे तक के कमरों का एक पूरा वर्टिकल हिस्सा दिया जाता था, ताकि सबको बराबर जगह मिल सके. इस इमारत के ठीक बीचोबीच एक बहुत बड़ा खुला आंगन होता था, जहां पूरा समुदाय एक साथ बैठकर त्योहार मनाता था, जरूरी बैठकें करता था और रोजमर्रा के काम निपटाता था.
बिना आधुनिक तकनीक के कैसे इतने मजबूत होते थे ये घर?
इन ऐतिहासिक और विशालकाय ढांचों को खड़ा करने के लिए आधुनिक जमाने के सीमेंट, कंक्रीट या फिर लोहे का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया गया था. इनको पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर मिलने वाली प्राकृतिक चीजों जैसे गीली मिट्टी, मजबूत लकड़ी, पत्थरों और बांस के टुकड़ों की मदद से तैयार किया गया था. इसकी कई फीट चौड़ी मिट्टी की दीवारें प्राकृतिक इंसुलेटर का काम करती थीं, जो कड़कड़ाती सर्दियों में अंदर के माहौल को गर्म और चिलचिलाती गर्मी में बेहद ठंडा रखती थीं. बिना किसी हीटर या एसी के भी तापमान हमेशा आरामदायक बना रहता था, जिसे आज के इंजीनियर भी सस्टेनेबल आर्किटेक्चर का बेहतर नमूना मानते हैं.
इन घरों के लिए कैसे होता था जगह का चुनाव?
फुजियान तुलू का निर्माण किसी भी स्थान पर नहीं कर दिया जाता था. इसके लिए भूगोल का खास ध्यान रखा जाता था. इन घरों को बनाने के लिए हमेशा ऐसी जगह चुनी जाती थी जहां ऊंचे पहाड़, नदियां, खेती के लिए उपजाऊ जमीन होती थी. चीन की प्राचीन और पारंपरिक फेंगशुई मान्यताओं के अनुसार, ऐसी जगहों पर रहने से परिवार में सुख, समृद्धि और सुरक्षा हमेशा बनी रहती है. यही वजह है कि इन इमारतों को आसपास के पर्यावरण को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, प्रकृति के साथ एकदम सही तालमेल बिठाकर बहुत सलीके से ढाला गया था.
यूनेस्को की धरोहर में हुई शामिल
तुलू की इसी एतिहासिक, सामाजिक और बेजोड़ सांस्कृति अहमियत को समझते हुए साल 2008 में यूनेस्को ने इनको आधिकारिक रूप से विश्व धरोहर का दर्जा दिया था. उनका मानना है कि ये इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं बल्कि उस दौर में सुरक्षा के तालमेल और आपसी भाईचारे की मिसाल हैं.
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