Chhattisgarh Anti Conversion Law: जबरन धर्मांतरण भारत में काफी संवेदनशील मुद्दा है. इस मामले के तहत तमाम लोगों को सजा भी हुई है. इसी के मद्देनजर छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026 के राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही अवैध धर्मांतरण के खिलाफ कार्रवाई की नई व्यवस्था लागू हो चुकी है. राज्य सरकार की विस्तृत नियमावली ने इस कानून के तहत लागू होने वाली कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी तरह साफ कर दिया है. छत्तीसगढ़ के इस कदम के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि देश के किन-किन राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून प्रभावी हैं और कानूनी सख्ती के मामले में कौन सा राज्य सबसे आगे खड़ा है. आइए कानूनी प्रावधानों के जरिए पूरे देश की स्थिति को बारीकी से समझते हैं.

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देश के कितने राज्यों में सक्रिय है धर्मांतरण विरोधी कानून?

वर्तमान में भारत के करीब 12 राज्यों में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए विशेष कानून लागू हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं. इसके साथ ही छत्तीसगढ़ भी इस सूची में आधिकारिक रूप से शामिल हो चुका है. इन सभी राज्यों में जबरन, लालच देकर, धोखे से या शादी की आड़ में कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए अलग-अलग स्तर की सजा तय की गई है.

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धर्मांतरण कानून पर किस राज्य में सबसे सख्त कानून?

देश में सबसे कठोर कानूनी प्रावधान उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान में देखने को मिलते हैं. उत्तराखंड में नए संशोधनों के बाद धोखे या दबाव में कराए गए धर्मांतरण पर 20 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का नियम है. वहीं उत्तर प्रदेश में भी सामान्य मामलों में 10 से 14 साल की कैद है, लेकिन महिला, नाबालिग या एससी-एसटी वर्ग से जुड़े मामलों में सजा 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है. इसी तरह राजस्थान में भी गंभीर मामलों में उम्रकैद तक का कड़ा प्रावधान रखा गया है.

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मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कानूनी प्रावधान

मध्य प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम लागू है, जिसके तहत अवैध तरीके से धर्मांतरण कराने वाले दोषी को 10 साल तक की जेल और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. महाराष्ट्र में हाल ही में लागू महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पहली बार अपराध करने पर 7 साल और बार-बार ऐसा करने पर 10 साल तक की कैद का प्रावधान किया गया है. इन दोनों ही राज्यों में जबरन या बहला-फुसलाकर कराए गए धर्मांतरण को एक गंभीर और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है.

सामूहिक धर्मांतरण कराने पर क्या होती है कार्रवाई?

सामूहिक रूप से एक साथ कई लोगों का धर्म परिवर्तन कराने पर लगभग सभी राज्यों में और भी ज्यादा सख्त कार्रवाई का नियम है. ऐसे मामलों में गैर-जमानती धाराएं लगाई जाती हैं और अभियुक्त को आसानी से जमानत नहीं मिलती है. इसके अलावा इस कानून में यह साफ किया गया है कि इन मामलों की सुनवाई सेशन कोर्ट से नीचे की निचली अदालतों में नहीं होगी. इससे न्यायिक जांच को अधिक गंभीर और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है.

शादी का धर्मांतरण से क्या है लिंक?

लगभग सभी राज्यों के कानूनों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि यदि किसी विवाह का एकमात्र मकसद केवल धर्म परिवर्तन कराना ही था, तो ऐसी शादी को कानूनन अमान्य या शून्य घोषित कर दिया जाएगा. इस नियम का मुख्य उद्देश्य शादी की आड़ में होने वाले अवैध धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना है. अगर कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से भी धर्म बदलना चाहता है, तो उसे धर्मांतरण से 30 से 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित सूचना देना अनिवार्य किया गया है, जिसके बाद पुलिस निष्पक्ष जांच करती है. इसके बाद ही धर्म परिवर्तन कराया जा सकता है.

डिजिटल प्रचार पर भी पाबंदी

उत्तराखंड जैसे राज्यों ने अपने कानून में तो डिजिटल और सोशल मीडिया के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण प्रचार पर भी कड़ी रोक लगाई है. हालांकि, इन कठोर कानूनों की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाई कोर्ट्स में याचिकाएं भी लंबित हैं. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसे नियम व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अपनी पसंद के धर्म को मानने और निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, जबकि राज्य सरकारों का मानना है कि यह सामाजिक ताने-बाने की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है.

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