कॉकरोच जनता पार्टी ने चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद की खबरों के आधार पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है. पार्टी ने इस मुद्दे पर 2 अक्टूबर से मुंबई में धरना प्रदर्शन करने का फैसला किया है. इस मांग के सामने आने के बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद से इस्तीफा दे दें, तो चुनाव आयोग की प्रशासनिक व्यवस्था और फैसले लेने की प्रक्रिया पर इसका क्या असर पड़ेगा और उनकी गैर-मौजूदगी में कौन कामकाज संभालेगा?

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कैसे देते हैं त्यागपत्र?

मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी भी अन्य चुनाव आयुक्त के पद छोड़ने का नियम साल 2023 के कानून की धारा 11 में दर्ज है. नियम के मुताबिक, अगर मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद से हटना चाहते हैं, तो उन्हें देश के राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए लिखित चिट्ठी भेजनी होती है. ज्ञानेश कुमार के मामले में भी अगल वे इस्तीफा देते हैं तो वह राष्ट्रपति के पास ही जाएगा. इस्तीफा मंजूर होने के बाद ही पद खाली माना जाता है.

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इस्तीफे से नहीं रुकती आयोग की कार्रवाई

संविधान के अनुच्छेद 324 में यह साफ लिखा है कि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने, मतदाता सूची अपडेट करने और चुनावी निगरानी की जिम्मेदारी पूरे आयोग की होती है. इस समय आयोग में ज्ञानेश कुमार के साथ दो अन्य चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी भी काम कर रहे हैं. मुख्य आयुक्त के हट जाने से आयोग भंग नहीं होता, बल्कि बाकी दोनों आयुक्त संवैधानिक कामकाज और फैसले जारी रख सकते हैं.

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ज्ञानेश कुमार के बाद कौन देखेगा काम?

अक्सर यह माना जाता है कि मुख्य पद खाली होते ही आयोग का सबसे वरिष्ठ सदस्य अपने आप उस कुर्सी पर बैठ जाता है, लेकिन कानूनी रूप से ऐसा कोई नियम नहीं है. अनुच्छेद 324(2) के तहत यह अधिकार राष्ट्रपति के पास है. अनुच्छेद 324(3) सिर्फ यह कहता है कि मुख्य आयुक्त आयोग के अध्यक्ष की भूमिका निभाएंगे, लेकिन यह कहीं नहीं लिखा कि मौजूदा चुनाव आयुक्तों में से कोई बिना आधिकारिक आदेश के अपने आप मुख्य चुनाव आयुक्त बन जाएगा.

तीन सदस्यों की कमेटी करती है चुनाव

नए मुख्य चुनाव आयुक्त के चुनाव के लिए 2023 के कानून की धारा 7 के तहत एक खास समिति बनाई गई है. इस तीन सदस्यीय चयन समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं. इसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा तय किए गए एक कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं. यह कमेटी पहले से तैयार सर्च पैनल की लिस्ट पर चर्चा करती है और अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजती है, जिसके बाद ही आधिकारिक नियुक्ति होती है.

चयन प्रक्रिया में सरकार के पास क्या विकल्प?

सर्च कमेटी योग्य अफसरों के नामों का एक पैनल बनाती है, लेकिन चयन समिति के पास यह अधिकार होता है कि वह उस लिस्ट से बाहर के किसी पात्र व्यक्ति के नाम पर भी विचार कर सके. हालांकि परंपरा यही रही है कि आयोग में काम कर रहे वरिष्ठ चुनाव आयुक्त को ही अगला मुख्य आयुक्त बनाया जाता है, पर कानूनन सरकार किसी अन्य योग्य व्यक्ति को भी इस पद की जिम्मेदारी सौंप सकती है.

नए चुनाव तक कामकाज की व्यवस्था कौन देखता है?

कानून में किसी को अपने आप कार्यवाहक मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने या उप-मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे किसी अलग पद का कोई लिखित प्रावधान नहीं है. जब तक नया मुख्य चुनाव आयुक्त चुनकर नहीं आ जाता, तब तक आयोग में मौजूद दोनों चुनाव आयुक्त आपस में तालमेल बनाकर रोजमर्रा के काम निपटाते हैं. इस दौरान आयोग का कोई भी प्रशासनिक फैसला नहीं रुकता.

तो क्या CEC के हटते ही हो जाएगा संवैधानिक संकट? 

मुख्य चुनाव आयुक्त का पद खाली होने से देश में कोई बड़ा संवैधानिक संकट नहीं खड़ा होता है. चूंकि चुनाव आयोग कई सदस्यों से मिलकर बना एक संस्थान है, इसलिए इसका अस्तित्व बना रहता है. असल बात यह होती है कि सरकार कितनी जल्दी चयन प्रक्रिया पूरी करके नए अध्यक्ष की नियुक्ति करती है, ताकि आयोग का कामकाज बिना किसी रुकावट के पूरी क्षमता के साथ चलता रहे.

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