Purple Carrots: जब भी आप गाजर के बारे में सोचते हैं तो शायद आपके दिमाग में तुरंत चमकिला नारंगी रंग आता है. लेकिन आपको बता दें कि गाजर हमेशा से नारंगी रंग की नहीं थी. हजारों साल पहले वे आमतौर पर बैंगनी, सफेद और पीली हुआ करती थीं. अब मशहूर नारंगी गाजर असल में कई सदियों पहले डच किसानों द्वारा की गई सावधानी से चुनी हुई ब्रीडिंग का नतीजा है. गाजर का रंग कैसे बदला इसकी कहानी काफी दिलचस्प है.
गाजर का शुरुआती रंग
गाजर की खेती लगभग 5000 साल पहले सेंट्रल एशिया में शुरू हुई थी. यह उन इलाकों में शुरू हुई थी जो अब अफगानिस्तान का हिस्सा हैं. यह शुरुआती गाजर ज्यादातर बैंगनी और पीली होती थी. आज की मीठी और कुरकुरी किस्म के उलट पुरानी गाजर अक्सर पतली और कभी-कभी स्वाद में ज्यादा कड़वी होती थी. समय के साथ वे मिडिल ईस्ट और यूरोप में फैल गईं.
16वीं और 17वीं सदी में डच एक्सपेरिमेंट
यह बदलाव नीदरलैंड में 1500 के दशक के आखिर और 1600 के दशक की शुरुआत में हुआ. डच किसानों ने गाजर की अलग-अलग किस्मों, खासकर पीली और सफेद गाजर की म्यूटेंट किस्मों को क्रॉस ब्रीड करके एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया. सिलेक्टिव ब्रीडिंग के जरिए उन्होंने बीटा कैरोटीन की ज्यादा मात्रा वाली एक नई किस्म बनाई. यह वही पिगमेंट है जो चमकीले नारंगी रंग के लिए जिम्मेदार है. खेती में हुई इस नई खोज ने धीरे-धीरे पूरे यूरोप में पुरानी बैंगनी किस्म की जगह ले ली. नारंगी गाजर रंग, स्वाद और बनावट में ज्यादा स्टेबल साबित हुई.
नारंगी को ही क्यों चुना गया?
एक मशहूर लोक कथा नारंगी गाजर को विलियम ऑफ ऑरेंज और डच शाही खानदान जिसे हाउस ऑफ ऑरेंज नासाउ नाम से जाना जाता है, से जोड़ती है. इस कहानी के मुताबिक डच किसानों ने अपने नेशनल हीरो के सम्मान में नारंगी गाजर बनाईं. ऐसा इसलिए क्योंकि नारंगी रंग डच पहचान का प्रतीक बन गया था.
खाना बनाने और खाने के फायदे
बैंगनी गाजर में एंटीऑक्सीडेंट काफी ज्यादा होते हैं लेकिन पकाने पर उनका गहरा रंग फीका पड़ जाता है. इस वजह से कभी-कभी सूप और डिश गहरे या फिर धुंधले हो जाते हैं. इसके उलट नारंगी गाजर पकाने के बाद भी आकर्षक दिखती है. पोषण के लिहाज से नारंगी गाजर में बीटा कैरोटीन की मात्रा ज्यादा होती है, जो उन्हें खास तौर पर कीमती बनाती है. बीटा कैरोटीन इंसान के शरीर में विटामिन A में बदल जाता है. यह आंखों की सेहत, इम्यूनिटी और पूरी सेहत के लिए काफी अच्छा है.
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