Tamil Nadu Politics: सरकार के लिए न बुलाने पर क्या राज्यपाल के खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं विजय, जानें कब हो चुका ऐसा?
Tamil Nadu Politics: सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए विजय राज्यपाल से दो बार मुलाकात कर चुके हैं. लेकिन उन्हें हरी झंडी नहीं मिली है. आइए जानते हैं क्या विजय कोर्ट का सहारा ले सकते हैं.

- तमिलनाडु में बहुमत न मिलने पर विजय सरकार बनाने में असमर्थ।
- राज्यपाल के फैसले को अदालत में चुनौती देने की संभावना।
- विधानसभा में बहुमत परीक्षण का सिद्धांत सर्वोपरि माना जाता है।
- कर्नाटक, बिहार, उत्तराखंड के पूर्व फैसलों से मिलेगा मार्गदर्शन।
Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक स्थिति काफी ज्यादा ऊपर नीचे हो रही है. दरअसल चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाई. विजय और उनकी पार्टी टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन इसके बावजूद भी वह बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई. कांग्रेस के समर्थन के बाद भी विजय की सीटों की संख्या कथित तौर पर बढ़कर 113 हो गई है. सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर से दो बार मुलाकात करने के बावजूद उन्हें अभी तक सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं मिला है. आइए जानते हैं कि क्या विजय राज्यपाल के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं?
क्या राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी जा सकती है?
संवैधानिक रूप से राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी जा सकती है. राज्यपाल के कार्य पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होते. हालांकि सरकार बनाने के मामले में राज्यपालों के पास विवेकाधीन शक्तियां होती हैं. लेकिन अगर उन शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से या फिर असंवैधानिक तरीके से किया जाता है तो वह न्यायिक समीक्षा के अधीन होती हैं.
अगर कोई राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी के नेता को बहुमत साबित करने का मौका दिए बिना ही नजरअंदाज कर देता है तो प्रभावित पार्टी उच्च न्यायालय या फिर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है. ऐसे मामले में मुख्य तर्क यह होगा कि राज्यपाल ने अनुचित तरीके से काम किया है.
विजय का सबसे मजबूत कानूनी तर्क
अदालतों द्वारा स्थापित सबसे जरूरी सिद्धांत में से एक यह है कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर होना चाहिए ना कि सिर्फ राजभवन के अंदर इसका फैसला किया जाना चाहिए. इस वजह से विजय की पार्टी अदालत से यह निर्देश देने का अनुरोध कर सकती है कि राज्यपाल फ्लोर टेस्ट करवाएं. 1994 में आए ऐतिहासिक एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ फैसले के बाद सिद्धांत को संवैधानिक रूप से ज्यादा महत्व मिला था.
उस फैसले में इस बात पर जोर दिया गया था कि बहुमत के समर्थन से जुड़े सवालों का निपटारा किसी व्यक्ति की अपनी राजनीतिक सोच या फिर आकलन के आधार पर नहीं बल्कि विधानसभा में मतदान के जरिए से ही किया जाना चाहिए.
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कर्नाटक 2018 मामला
इसका सबसे मशहूर उदाहरण 2018 में कर्नाटक में देखने को मिला था. उस समय राज्यपाल वजुभाई वाला ने भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. वहीं कांग्रेस-JD(S) गठबंधन ने बहुमत का समर्थन होने का दावा किया था. यह मामला देर रात हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. अदालत ने तुरंत हस्तक्षेप किया और बहुमत साबित करने के लिए दी गई 15 दिनों की समय सीमा को घटाकर तत्काल फ्लोर टेस्ट करवाने का आदेश दिया.
बिहार 2005 मामला
2005 में बिहार से एक और अहम मिसाल सामने आई. राजनीतिक अनिश्चितता के माहौल में राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस सिफारिश को संवैधानिक करार करते हुए यह फैसला दिया कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग राजनीतिक मकसदों के लिए अपनी विवेकाधीन शक्तियों का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकते.
उत्तराखंड 2016 मामला
2016 में उत्तराखंड में हरीश रावत की सरकार को लेकर पैदा हुआ संकट भी सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा था. कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटा दिया और फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया. आखिरकार बहुमत साबित होने के बाद चुनी हुई सरकार को बहाल कर दिया गया.
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