वैश्विक स्तर पर डी-डॉलेराइजेशन को लेकर ब्रिक्स देशों के सम्मेलनों में काफी बड़ी बहस छिड़ी हुई है. इसके विपरीत, कुछ समय पहले यूरोप के बुल्गेरिया ने अपनी मुद्रा लेव को पूरी तरह से बंद कर यूरोपीय संघ की आम मुद्रा यूरो को अपनी लिया. ऐसे बड़े वैश्विक बदलावों के बीच आर्थिक जगत में एक बड़ा सवाल अक्सर चर्चा में रहता है कि क्या कोई देश अपनी खुद की करेंसी को 100% बंद करके किसी दूसरे देश की करेंसी को अपने यहां कानूनी तौर पर चला सकता है. आइए जानते हैं कि इसके पीछे के नियम क्या हैं और कोई देश ऐसा बड़ा कदम क्यों उठाता है.

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संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियम

अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, दुनिया का कोई भी देश अपनी घरेलू मौद्रिक नीति तय करने के लिए पूरी तरह आजाद है. यदि किसी देश की सरकार और वहां का सेंट्रल बैंक यह संयुक्त फैसला करता है कि वे अपनी मुद्रा को छोड़ रहे हैं, तो वे कानूनी रूप से किसी अन्य विदेशी मुद्रा को अपने देश की आधिकारिक करेंसी घोषित कर सकते हैं.

इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस देश की करेंसी को अपनाया जा रहा है, उस देश की सरकार से आमतौर पर कोई लिखित अनुमति या आधिकारिक समझौते की जरूरत भी नहीं होती है. 

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मजबूरी में लिया जाने वाला फैसला

कोई भी देश अपनी चलती हुई करेंसी को खुशी से कभी बंद नहीं करता है. इसके पीछे आमतौर पर उस देश के बेहद गंभीर और डरावने आर्थिक संकट होते हैं. जब किसी देश में महंगाई नियंत्रण से बाहर हो जाए और वहां के नोटों की कीमत रद्दी कागज जैसी हो जाए, तब सरकार अपनी करेंसी बदलने या बंद करने पर मजबूर होती है. इसे आर्थिक भाषा में हाइपरइन्फ्लेशन कहते हैं.

इसके अलावा जब जनता का अपनी ही सरकार और देश के केंद्रीय बैंक से भरोसा पूरी तरह टूट जाता है, तो लोग घरेलू करेंसी की जगह खुद-ब-खुद विदेशी मुद्रा में लेनदेन करना पसंद करने लगते हैं. जब स्थानीय मुद्रा की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार गिरती चली जाए और उसे संभालना नामुमकिन हो जाए, तब भी यह फैसला लिया जाता है.

इस बड़े फैसले के नफा-नुकसान

दूसरे देश की मजबूत करेंसी अपनाने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि बर्बाद हो रहे बाजार में अचानक स्थिरता आ जाती है और बेलगाम महंगाई पर तुरंत लगाम लग जाती है. लोगों का करेंसी पर भरोसा लौट आता है, जिससे विदेशी व्यापार और निवेश बेहद आसान हो जाता है.

लेकिन इसके नुकसान भी बहुत बड़े और दूरगामी होते हैं. ऐसा करने पर वह देश अपनी खुद की मौद्रिक नीति पर से सारा नियंत्रण खो देता है. वह देश अपनी जरूरत के हिसाब से न तो नए नोट छाप सकता है और न ही अपनी मर्जी से ब्याज दरों में कोई बदलाव कर सकता है. एक तरह से वह देश आर्थिक और वित्तीय रूप से पूरी तरह से उस दूसरे देश पर निर्भर हो जाता है, जिसकी करेंसी का वह इस्तेमाल कर रहा है.

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विदेशी करेंसी अपनाने वाले देश

साल 2000 में भयंकर आर्थिक संकट और महंगाई से बुरी तरह जूझने के बाद इक्वाडोर ने अपनी खुद की करेंसी सुक्रे को हमेशा के लिए बंद कर दिया था और अमेरिकी डॉलर को अपनी ऑफिशियल करेंसी बना लिया. इसी तरह साल 2009 में जिम्बाब्वे में महंगाई इस कदर बढ़ी कि सरकार को 100 ट्रिलियन डॉलर का नोट तक छापना पड़ा था, जिसके बाद सरकार ने अपनी करेंसी को सस्पेंड कर अमेरिकी डॉलर और दक्षिण अफ्रीकी रैंड का इस्तेमाल शुरू किया. इस सूची में एल साल्वाडोर का नाम भी शामिल है जिसने साल 2001 में अपनी करेंसी कोलोन को छोड़कर अमेरिकी डॉलर को अपना लिया था.

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