Chief Election Commissioner Powers: चुनाव आयोग के अंदर मतभेदों की रिपोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों की शक्तियों पर सवाल उठाए हैं. एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त डॉ सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों पर लिखित असहमति जताई है. 

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इस घटनाक्रम ने विपक्ष की तरफ से आलोचना शुरू कर दी है और कुछ एनडीए सहयोगियों ने भी चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है. इस स्थिति के बीच एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों को हटा सकते हैं? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयुक्तों को हटा सकते हैं?

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इसका जवाब है, नहीं. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्तों को सीधे पद से नहीं हटा सकते. संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के तहत चुनाव आयुक्त को हटाने का आखिरी अधिकार भारत के राष्ट्रपति के ही पास है. हालांकि राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को तब तक नहीं हटा सकते जब तक की मुख्य चुनाव आयुक्त हटाने की सिफारिश ना कर दे. इसका मतलब यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका हटाने की सिफारिश करना है जबकि औपचारिक निष्कासन राष्ट्रपति द्वारा ही किया जाता है.

अनुच्छेद 324 क्या कहता है? 

अनुच्छेद 324 (5) मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों के लिए संवैधानिक सुरक्षा के अलग-अलग स्तर स्थापित करता है. मुख्य चुनाव आयुक्त के पास उच्च स्तर की सुरक्षा है और उसे सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के लिए लागू प्रक्रिया के जरिए से ही हटाया जा सकता है. इस वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त के पास किसी दूसरे आयुक्त के खिलाफ सीधे बर्खास्तगी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है.

सिफारिश हटाने से अलग है 

सिफारिश और वास्तविक निष्कासन के बीच अंतर जरूरी है. अगर मुख्य  चुनाव आयुक्त का मानना है कि चुनाव आयुक्त को हटा दिया जाना चाहिए तो मुख्य चुनाव आयुक्त राष्ट्रपति को सिफारिश भेज सकता है. मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश एक जरूरी कदम है लेकिन यह अपने आप आयुक्त को पद से नहीं हटाती है. अंतिम आदेश राष्ट्रपति की तरफ से आता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में क्या होता है? 

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया काफी अलग है. चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के सामने सुरक्षा मिली हुई है. निष्कासन सिर्फ सिद्ध कदाचार या फिर अक्षमता के आधार पर ही हो सकता है और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में महाभियोग जैसी मुश्किल प्रकिया की जरूरत होती है. निष्कासन के प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई का खास बहुमत मिला होना चाहिए. 

दूसरे चुनाव आयुक्तों के बारे में क्या?

दूसरे चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए संसदीय अनुमोदन की जरूरत नहीं होती. उनका निष्कासन मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही निर्भर करता है. इस अनिवार्य सिफारिश के बिना राष्ट्रपति अपने आप किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकते. यह मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों के पदों के बीच एक साफ संवैधानिक अंतर पैदा करता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त उन्हें सीधे बर्खास्त क्यों नहीं कर सकता? 

इसके पीछे दो बड़ी वजह हैं. सबसे पहले संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की सिफारिश करने की शक्ति देता है ना कि अंतिम हटाने का आदेश जारी करने की. इस वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा जारी कोई भी सीधा निलंबन या फिर बर्खास्तगी आदेश औपचारिक संवैधानिक निष्कासन नहीं होगा. दूसरा, मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश एक स्वतंत्र बर्खास्तगी शक्ति के बजाय एक खास संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है.

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तो सत्ता किसके पास है? 

आसान शब्दों में इस प्रक्रिया को तीन चरणों में समझा जा सकता है. पहला चरण यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त दूसरे चुनाव आयुक्त को हटाने की सिफारिश कर सकते हैं. दूसरा चरण यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के अधीन चुनाव आयुक्त को हटाने का औपचारिक अधिकार राष्ट्रपति रखते हैं. तीसरा चरण यह है कि संसद उस कार्यकाल पर लागू खास प्रक्रिया के जरिए से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने में भूमिका निभाती है.

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