Teesta River Project: बांग्लादेश ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना का काम चीन को सौंपने का फैसला किया है. यह इस इलाके की भू राजनीतिक स्थिति में एक बड़ा बदलाव है. यह फैसला तब लिया गया जब बांग्लादेश ने इस परियोजना के लिए भारत के निवेश प्रस्ताव को ठुकरा दिया और इसके बजाय चीन से लगभग 7000 करोड़ का आसान लोन लेना स्वीकार किया. इसी के साथ इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹9000 करोड़ है. आइए जानते हैं कि इस कदम के बाद भारत के लिए क्या मुश्किल खड़ी होगी.
तीस्ता परियोजना क्यों जरूरी है?
तीस्ता नदी सिक्किम से निकलती है, पश्चिम बंगाल से होकर बहती है और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है. एक साझा नदी होने के नाते यह दोनों देशों के बीच सिंचाई, जल प्रबंधन और क्षेत्रीय सहयोग में एक बड़ी भूमिका निभाती है. जून 2026 में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक रहमान की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना के लिए तकनीकी सहयोग और संयुक्त अध्ययन पर सहमति दिखाई थी. भारत ने भी इस परियोजना में निवेश करने में रुचि दिखाई थी लेकिन बांग्लादेश ने इसके बजाय चीन के प्रस्ताव को चुना.
सिलीगुड़ी गलियारे को लेकर चिंता
भारत की सबसे बड़ी चिंता में से एक है इस परियोजना का सिलीगुड़ी गलियारे के पास होना. इसे अक्सर चिकन नेक के नाम से जाना जाता है. जमीन का यह संकरा हिस्सा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है. रणनीतिक रूप से जरूरी इस कॉरिडोर के पास चीनी मौजूदगी में किसी भी तरह की बढ़ोतरी को भारतीय सुरक्षा विश्लेषक चिंता का विषय मानते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यह भारत की कनेक्टिविटी और रक्षा लॉजिस्टिक्स के लिए काफी जरूरी है.
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भारतीय सीमा के पास चीनी कर्मियों की मौजूदगी
इस परियोजना के कार्य में चीनी इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ और भारी निर्माण उपकरण के शामिल होने की उम्मीद है. कुछ भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों ने इस बात की चिंता दिखाई है की सीमा के इतने करीब चीनी कर्मियों की मौजूदगी से निगरानी का जोखिम बढ़ सकता है या फिर भौगोलिक और बुनियादी ढांचे से संबंधित जानकारी इकट्ठा करने के अवसर मिल सकते हैं.
नदी से जुड़े डेटा का महत्व
तीस्ता भारत और बांग्लादेश के बीच बहने वाली एक सीमा पार नदी है. इस वजह से जल प्रबंधन के लिए इससे जुड़ी हाइड्रोलॉजिकल जानकारी काफी जरूरी है. इस प्रोजेक्ट के तहत नदी के बहाव जलस्तर और हाइड्रोलॉजी से जुड़े तकनीकी डेटा को इकट्ठा करने और मैनेज करने में चीनी कंपनियों के शामिल होने की उम्मीद है. कुछ भारतीय विश्लेषकों का यह तर्क है कि ऐसी जानकारी तक पहुंच रणनीतिक रूप से जरूरी हो सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह एक साझा नदी प्रणाली से जुड़ी है.
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