मस्तानी के प्यार और अपनी बेजोड़ युद्ध कला के लिए मशहूर पेशवा बाजीराव प्रथम भारतीय इतिहास के उन महानतम नायकों में से हैं, जिन्होंने अपने जीवन में 41 से अधिक युद्ध लड़े और एक भी लड़ाई नहीं हारी. उनके सैन्य आक्रमण इतने तेज और रणनीतिक होते थे कि दिल्ली के मुगल शासक से लेकर हैदराबाद के निजाम तक उनके नाम से कांपते थे. लेकिन चमकती तलवारों और ऐतिहासिक जीतों के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं. अपनी पूरी जिंदगी युद्ध के मैदान में गुजारने वाले और मराठा साम्राज्य का परचम फहराने वाले बाजीराव पेशवा अपने निजी जीवन में भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए थे. हालात इतने गंभीर थे कि कर्जदारों के तानों से तंग आकर उन्होंने यहां तक लिख दिया था कि इस जिल्लत से तो मौत बेहतर है.
क्यों कर्ज के जाल में फंसे बाजीराव पेशवा?
साम्राज्य का विस्तार करने और अपनी विशाल सेना को बनाए रखने के लिए भारी भरकम पैसों की जरूरत होती थी. बाजीराव पेशवा ने विशेष मराठा घुड़सवार सेना का गठन किया था, जो बिजली जैसी फुर्ती से हमला करने के लिए जानी जाती थी. उनकी सेना में लगभग 50 हजार घुड़सवार सैनिक शामिल थे. इन सैनिकों को समय पर वेतन देना, घोड़ों के चारे का प्रबंध करना और हथियारों का रखरखाव करने में बहुत बड़ा खर्च आता था.
बाजीराव की यह नीति थी कि वे अपने सैनिकों का वेतन कभी नहीं रोकते थे, भले ही इसके लिए उन्हें खुद कर्ज लेना पड़े. चूंकि मुगल गवर्नरों से मिलने वाली चौथ की वसूली में अक्सर देरी हो जाती थी, इसलिए सेना का दैनिक खर्च चलाने के लिए उन्हें मजबूरन साहूकारों से उधार लेना पड़ता था.
कितना था कुल उधार और कितनी थी ब्याज दर?
इतिहासकारों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, लगातार सैन्य अभियानों और टैक्स वसूली में देरी की वजह से साल 1732 तक पेशवा बाजीराव पर 30 लाख रुपये से लेकर 80 लाख रुपये तक का भारी कर्ज हो चुका था. 18वीं शताब्दी के लिहाज से यह रकम इतनी बड़ी थी कि आज के समय में इसकी कीमत अरबों रुपये के बराबर मानी जाएगी.
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उस जमाने में इन कर्जों पर सालाना 30 प्रतिशत तक का भारी-भरकम ब्याज वसूला जाता था. इस चक्रवर्ती ब्याज के कारण बाजीराव का वित्तीय संकट समय के साथ और गहराता चला गया.
यह भी पढ़ें: दुनिया के कितने मुस्लिम देशों में मनाई जाती है दीपावली, कहां-कहां रहती है छुट्टी?
कहां से लिया था कर्ज और कौन थे वे साहूकार?
अपनी सैन्य टुकड़ियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजीराव ने मुख्य रूप से पुणे और सतारा के अमीर साहूकारों और महाजनों से पैसा उधार लिया था. इनमें महादजी जोशी जैसे कई बड़े वित्तीय सलाहकार और व्यापारी शामिल थे, जिन्होंने समय-समय पर उन्हें लाखों रुपये की आर्थिक मदद दी थी.
इसके अलावा, बाजीराव के आध्यात्मिक गुरु ब्रह्मेंद्र स्वामी भी उनके एक बड़े कर्जदाता थे. ब्रह्मेंद्र स्वामी मराठा साम्राज्य के बड़े-बड़े सरदारों को ब्याज पर पैसा उधार दिया करते थे, जिसे धार्मिक भाषा में श्री का पैसा कहा जाता था. बाजीराव ने अपने गुरु स्वामी से भी कई बार हजारों रुपये का कर्ज लिया था.
यह भी पढ़ें: इस शख्स से ही भगत सिंह ने सीखा था बम बनाना, 63 दिन तक की थी भूख हड़ताल
