Khamenei Funeral Ceremony: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार का आधिकारिक कार्यक्रम जारी हो चुका है, जिसके तहत 4 और 5 जुलाई को तेहरान में विदाई समारोह और नमाज-ए-जनाजा का आयोजन होगा. सरकार ने उनको इस्लामिक रिवॉल्यूशन का शहीद लीडर घोषित किया है. इस भावुक माहौल के बीच बहुत से गैर-मुस्लिमों और आम लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि इस अंतिम यात्रा के दौरान वहां मौजूद लाखों लोग सजदा क्यों नहीं करेंगे, आखिर इसको लेकर इस्लाम में क्या नियम है.

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जनाजे की आखिरी दुआ में क्यों नहीं करते सजदा?

इस्लाम में किसी भी शख्स की मौत के बाद जो नमाज पढ़ी जाती है, उसे नमाज-ए-जनाजा कहा जाता है. आम दिनों में पांच वक्त की जाने वाली नमाज की तरह कोई ईश्वर की पारंपरिक इबादत है, बल्कि यह पूरी तरह से मृतक के लिए की जाने वाली खास दुआ होती है. इसका मख्य उद्देश्य दुनिया से रुखसत हो चुके इंसान के गुनाहों की माफी और ईश्वर से उसके लिए रहमत की गुजारिश करना होता है. चूंकि यह सिर्फ एक सिफारिशी दुआ है, इसलिए इसमें आम नमाज की तरह घुटनों पर झुकने (रुकू) या जमीन पर सजदा नहीं किया जाता है.

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कब किया जाता है सजदा?

इस्लाम में बुनियादी सिद्धातों के अनुसार सजदा सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के लिए ही किया जा सकता है, किसी इंसान के आगे नहीं. जनाजे की नमाज के दौरान मृतक का पार्थिक शरीर नमाज पढ़ने वाले लोगों के ठीक सामने रखा होता है. ऐसे में अगर वहां सजदा किया जाए तो देखने वालों को यह भ्रम हो सकता है कि लोग ईश्वर के बजाय उस मृत व्यक्ति के सामने सजदा कर रहे हैं. इस गलतफहमी से बचने के लिए भी सजदे की मनाही है.

शरीयत की तय परंपरा का पालन

इस्लामी कानून शरीयत के अनुसार, हर धार्मिक काम को करने का तय और अपरिवर्तनीय तरीका है. पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) ने अंतिम संस्कार की इस खास दुआ का तरीका सिखाया था, उसमें केवल सीधे खड़े रहने का नियम है. इस नमाज को चार तकबीरों (अल्लाह-हू-अकबर कहना) के साथ सिर्फ खड़े होकर पूरा किया जाता है, जिसमें ईश्वर की तारीफ, दरूद शरीफ और मृतक के लिए खास दुआएं शामिल होती है. पूरी दुनिया के मुसलमान आज भी इस नियम का पालन करते हैं.

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